Kṛṣṇa at Duryodhana’s House: Refusal of Hospitality and Departure to Vidura (कृष्णस्य धार्तराष्ट्रनिवेशनगमनम्)
क्रोधं बलममर्ष च यो निधाय परंतप: । जितात्मा पाण्डवोअमर्षी भ्रातुस्तिष्ठति शासने,“मधुसूदन! जो पाण्डुनन्दन महाबली भीम दस हजार हाथियोंके समान शक्तिशाली है, जिसका वेग वायुके समान है, जो असहिष्णु होते हुए भी अपने भाईको सदा ही प्रिय है और भाइयोंका प्रिय करनेमें ही लगा रहता है, जिसने भाई-बन्धुओंसहित कीचकका विनाश किया है, जिस शूरवीरके हाथसे क्रोधवश नामक राक्षसोंका, हिडिम्बासुर तथा बकका भी संहार हुआ है, जो पराक्रममें इन्द्र, बलमें वायुदेव तथा क्रोधमें महेश्वरके समान है, जो प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें सर्वश्रेष्ठ एवं भयंकर है, शत्रुओंको संताप देनेवाला जो पाण्डुपुत्र भीम अपने भीतर क्रोध, बल और अमर्षको रखते हुए भी मनको काबूमें रखकर सदा भाईकी आज्ञाके अधीन रहता है, जो स्वभावत:ः अमर्षशील है, जिसमें तेजकी राशि संचित है, जो महात्मा, सर्वश्रेष्ठ, अमिततेजस्वी तथा देखनेमें भी भयंकर है, वृष्णिनन्दन जनार्दन! उस मेरे द्वितीय पुत्र भीमसेनका समाचार बताओ। इस समय परिघके समान सुदृढ़ भुजाओंवाला मेरा मँझला पुत्र पाण्डुकुमार भीमसेन कैसे है?
vaiśampāyana uvāca | krodhaṁ balam amarṣaṁ ca yo nidhāya paraṁtapaḥ | jitātmā pāṇḍavo 'marṣī bhrātus tiṣṭhati śāsane ||
வைசம்பாயனர் கூறினார்—பகைவர்களைத் துன்புறுத்தும் அந்தப் பாண்டவன் இயல்பாகவே பொறாமையற்றாதவன், கடுஞ்சினத்தவன் ஆயினும், தன் உள்ளத்திலே கோபம், வலிமை, அமர்ஷம் ஆகியவற்றை அடக்கி வைத்திருக்கிறான். தன்னடக்கத்துடன் அண்ணனின் ஆணைக்கீழ் உறுதியாக நிற்கிறான்.
वैशम्पायन उवाच