Udyoga-parva Adhyāya 71 — Kṣatra-dharma Counsel, Public Legitimacy, and Mobilization
युधिछिर उवाच श्रुतं ते धृतराष्ट्रस्य सपुत्रस्य चिकीर्षितम् । एतद्धि सकलं॑ कृष्ण संजयो मां यदब्रवीत्,युधिष्ठिरने कहा--श्रीकृष्ण! पुत्रोंसहित राजा धृतराष्ट्र क्या करना चाहते हैं, यह सब तो आपने सुन ही लिया। संजयने मुझसे जो कुछ कहा है, वह धृतराष्ट्रका ही मत है। संजय धृतराष्ट्रका अभिन्नस्वरूप होकर आया था। उसने उन्हींके मनोभावको प्रकाशित किया है। दूत संजय स्वामीकी कही हुई बातको ही दुहराया है; क्योंकि यदि वह उसके विपरीत कुछ कहता तो वधके योग्य माना जाता
Yudhiṣṭhira uvāca: śrutaṁ te dhṛtarāṣṭrasya saputrasya cikīrṣitam | etad dhi sakalaṁ kṛṣṇa saṁjayo māṁ yad abravīt |
யுதிஷ்டிரன் கூறினான்—ஓ கிருஷ்ணா! மகன்களுடன் துருதராஷ்டிரன் என்ன செய்ய எண்ணுகிறான் என்பதை நீ ஏற்கனவே கேட்டுள்ளாய். சஞ்சயன் எனக்குச் சொன்ன அனைத்தும் துருதராஷ்டிரனின் கருத்தும் உறுதியும் தான்.
युधिछिर उवाच