Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Pramāda as Mṛtyu
Chapter 42
सम्भोगमें ही मन लगानेवाले, विषमता रखनेवाले, अत्यन्त मानी, दान देकर पश्चात्ताप करनेवाले, अत्यन्त कृपण, अर्थ और कामकी प्रशंसा करनेवाले तथा स्त्रियोंके द्वेषी--ये सात और पहलेके छ: कुल तेरह प्रकारके मनुष्य नृशंसवर्ग (क्रूर-समुदाय) कहे गये हैं ।। धर्मश्न सत्यं च दमस्तपश्च अमारत्सरय द्वीस्तितिक्षानसूया । यज्ञश्न दानं च धृति: श्रुतं च व्रतानि वै द्वादश ब्राह्मणस्य,धर्म, सत्य, इन्द्रियनिग्रह, तप, मत्सरताका अभाव, लज्जा, सहनशीलता, किसीके दोष न देखना, यज्ञ करना, दान देना, धैर्य और शास्त्रज्ञान--ये ब्राह्मण-के बारह व्रत हैं
dharmaś ca satyaṃ ca damas tapaś ca
amātsaryaṃ hrīs titikṣā anasūyā |
yajñaś ca dānaṃ ca dhṛtiḥ śrutaṃ ca
vratāni vai dvādaśa brāhmaṇasya ||
சனத்ஸுஜாதர் கூறினார்—தர்மம், சத்தியம், புலனடக்கம், தவம், பொறாமையின்மை, நாணம், பொறுமை, பிறர் குறை காணாமை, யாகம், தானம், திடநிலை, வேத/சாஸ்திரக் கல்வி—இவையே பிராமணனின் பன்னிரண்டு விரதங்கள்.
सनत्युजात उवाच