उद्योगपर्व अध्याय १३३ — संजये मातृउपदेशः
Udyoga Parva Adhyaya 133 — A Mother’s Counsel to Saṃjaya
यदैव लभते वीर: सुयुद्धेन महद् यश: । तदैव प्रव्यथन्ते5स्य शत्रवों विनमन्ति च,वीर पुरुष युद्धमें अपना नाम सुनाकर, कवचधारी शत्रुओंको ललकारकर, सेनाके अग्रभागको खदेड़कर अथवा शत्रुपक्षके किसी श्रेष्ठ पुरुषका वध करके जभी उत्तम युद्धके द्वारा महान् यश प्राप्त कर लेता है, तभी उसके शत्रु व्यथित होते और उसके सामने मस्तक झुकाते हैं
yadaiva labhate vīraḥ suyuddhena mahad yaśaḥ | tadaiva pravyathante 'sya śatravo vinamanti ca ||
வீரன் சிறந்த போரால் பெரும் புகழ் பெறும் அதே வேளையில், அவன் பகைவர்கள் கலங்கி அவன் முன் தலை வணங்குகிறார்கள்।
पुत्र उवाच