धन-राजधर्म संवादः
Discourse on Wealth and Royal Duty
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका खेदपूर्ण उद्गार नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ,कापालीं नृप पापिष्ठां वृत्तिमासाद्य जीवत: । संत्यज्य राज्यमृद्धं ते लोको5यं कि वदिष्यति || ॥!| - ॥ 5 ५ 5 वैश्य तुलाधारके द्वारा मुनि जाजलिका सत्कार ध्ज्यॉ गीताप्रेस, ग॑ नारदजीको भगवान्के विश्वरूपका दर्शन ।007: दि (८६-९६ भगवान् हयग्रीव वेदोंको रसातलसे लाकर ब्रह्माजीको लौटा रहे हैं गीताप्रेस, गोरखपुर इन्द्रकी ब्राह्मणवेषमें दैत्यराज प्रह्नलादसे भेंट नरेश्वरर जब आप यह समृद्धिशाली राज्य छोड़कर हाथमें खपड़ा लिये घर-घर भीख माँगनेकी नीचातिनीच वृत्तिका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करने लगेंगे, तब लोग आपको क्या कहेंगे?
kapālīṁ nṛpa pāpiṣṭhāṁ vṛttim āsādya jīvataḥ | saṁtyajya rājyam ṛddhaṁ te loko 'yaṁ kiṁ vadiṣyati ||
அரசே! நீ இந்த வளமிகு அரசைத் துறந்து, உயிரோடு இருக்கும்போதே, கையில் கபாலப் பாத்திரம் ஏந்தி வீடு வீடாகப் பிச்சை கேட்கும் மிகக் கண்டிக்கத்தக்க வாழ்வை ஏற்றுக்கொண்டால், இந்த உலகம் உன்னைப் பற்றி என்ன சொல்வது?
युधिछिर उवाच