बलीन्द्रसंवादः — Kāla, Anityatā, and the Limits of Agency
Mahābhārata 12.217
व्यक्तं मृत्युमुखं विद्यादव्यक्तममृतं पदम् | प्रवृत्तिलक्षणं धर्ममृषि्नारायणो<ब्रवीत्,भीष्मजी कहते हैं--राजन! जो मनुष्य सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग तथा प्रकृति और पुरुष--इन चारोंको नहीं जानता है, वह परब्रह्म परमात्माको नहीं जानता है। परम ऋषि नारायणने जिस व्यक्त और अव्यक्त तत्त्वका प्रतिपादन किया है, उसमें व्यक्त (दृश्यवर्ग) को मृत्युके मुखमें पड़नेवाला जाने और अव्यक्तको अमृतपद समझे तथा नारायण ऋषिने जिस प्रवृत्तिरूप धर्मका प्रतिपादन किया है, उसीपर चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी प्रतिष्ठित है। निवृत्तिरूप जो धर्म है, वह अव्यक्त सनातन ब्रह्मस्वरूप है
bhīṣma uvāca | vyaktaṁ mṛtyumukhaṁ vidyād avyaktam amṛtaṁ padam | pravṛttilakṣaṇaṁ dharmam ṛṣir nārāyaṇo 'bravīt ||
வெளிப்படுவதை மரணத்தின் வாயென அறிக; வெளிப்படாததை அமரப் பதமென உணர்க. செயற்பாட்டின் இலக்கணமுடைய தர்மத்தை ரிஷி நாராயணர் அறிவித்தார்.
भीष्म उवाच