प्राणिनामेवमन्येषां स्थादपीति विनाशनम् | शोकाग्निना दहामानो धम्यमान इवाशये,वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! कर्णका मारा जाना अद्भुत और अविश्वसनीय-सा लग रहा था। वह भयंकर कर्म उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाला था, जैसे मेरु पर्वतवका अपने स्थानसे हटकर अन्यत्र चला जाना। परम बुद्धिमान् भृगुनन्दन परशुरामजीके चित्तमें मोह उत्पन्न होना जैसे सम्भव नहीं है, जैसे भयंकर कर्म करनेवाले देवराज इन्द्रका अपने शत्रुओंसे पराजित होना असम्भव है, जैसे महातेजस्वी सूर्यके आकाशसे पृथ्वीपर गिरने और अक्षय जलवाले समुद्रके सूख जानेकी बात मनमें सोचीतक नहीं जा सकती; पृथ्वी, आकाश, दिशा और जलका सर्वनाश होना एवं पाप तथा पुण्य-- दोनों प्रकारके कर्मोका निष्फल हो जाना जैसे आश्वर्यजनक घटना है; उसी प्रकार समरमें कर्ण-वधरूपी असम्भव कर्मको भी सम्भव हुआ सुनकर और उसपर बुद्धिद्वारा अच्छी तरह विचार करके राजा धृतराष्ट्र यह सोचने लगे कि “अब यह कौरवदल बच नहीं सकता। कर्णकी ही भाँति अन्य प्राणियोंका भी विनाश हो सकता है।” यह सब सोचते ही उनके हृदयमें शोककी आग प्रज्वलित हो उठी और वे उससे तपने एवं दग्ध-से होने लगे। उनके सारे अंग शिथिल हो गये। महाराज! वे अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र दीनभावसे लंबी साँस खींचने और अत्यन्त दुःखी हो “हाय! हाय!” कहकर विलाप करने लगे संजय! मैं विष खाकर, अग्निमें प्रविष्ट होकर तथा पर्वतके शिखरसे नीचे गिरकर भी मृत्युका वरण कर लूँगा। परंतु अब ये कष्टदायक दुःख नहीं सह सकूँगा ।। इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्येडष्टमो 5ध्याय:
vaiśampāyana uvāca |
prāṇinām evam anyeṣāṁ sthād apīti vināśanam |
śokāgninā dahāmāno dhmyamāna ivāśaye ||
வைசம்பாயனர் கூறினார்—‘இவ்வாறே பிற உயிர்களுக்கும் அழிவு வரக்கூடும்’ என்று அவன் எண்ணினான். துயரத்தின் தீயால் எரிந்து, உள்ளத்தில் ஊதுகுழல் ஊதப்பட்டதுபோல் மேலும் மேலும் வேதனை பெருகினது.
वैशम्पायन उवाच
Unchecked attachment and delusion lead to ethical blindness; when consequences arrive, grief burns like fire. The verse frames sorrow as the inner result of recognizing inevitable destruction brought about by prior choices aligned with adharma.
After hearing and reflecting on the (previously unthinkable) death of Karṇa, Dhṛtarāṣṭra concludes that the Kaurava side cannot survive and that destruction may befall others as well. This realization ignites intense grief within him, described as a fire being fanned in his heart.