Adhyāya 41 — Kṛṣṇa’s Battlefield Briefing and the Renewal of the Great Engagement
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ८८ श्लोक हैं) ता निज: - महाडीनके सिवा, जो अन्य पचीस उड़ानें कही गयी हैं, उन सबका पृथक्-पृथक् एक-एक संपात (पंख फड़फड़ानेकी क्रिया) भी है, ये पचीस संपात जोड़नेसे एक सौ एक संख्याकी पूर्ति होती है। द्विचत्वारिशोड ध्याय: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्माणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना संजय उवाच मद्राधिपस्याधिरथिममहात्मा वचो निशम्याप्रियमप्रतीत: । उवाच शल्यं विदितं ममैतद् यथाविधावर्जुनवासुदेवौ,संजय कहते हैं--राजन्! मद्रराज शल्यकी ये अप्रिय बातें सुनकर महामनस्वी अधिरथपुत्र कर्णने असंतुष्ट होकर उनसे कहा--'शल्य! अर्जुन और श्रीकृष्ण कैसे हैं, यह बात मुझे अच्छी तरह ज्ञात है
sañjaya uvāca
madrādhipasyādhirathim mahātmā vaco niśamyāpriyam apratītaḥ |
uvāca śalyaṃ viditaṃ mama etad yathāvidhāv arjunavāsudevau ||
சஞ்சயன் கூறினான்—அரசே! மத்ரநாட்டின் அதிபதி சல்யன் சொன்ன அந்த இனிமையற்ற சொற்களை கேட்டதும், உயர்ந்த உள்ளம் கொண்ட அதிரதன் மகன் கர்ணன் மனம் வெதும்பி சல்யனை நோக்கி கூறினான்—“சல்யா! அர்ஜுனனும் வாசுதேவனும் (ஸ்ரீகிருஷ்ணனும்) எப்படிப்பட்டவர்கள் என்பது எனக்கு நன்கு தெரியும்.”
संजय उवाच