Karṇa’s advance against the Pāṇḍava host; Arjuna’s clash with the Saṃśaptakas (कर्णस्य पाण्डवसेनाप्रवेशः—अर्जुनस्य संशप्तकसंप्रहारः)
ततो वर्षसहस्रे तु समेष्याम: परस्परम् । एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि चानघ,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे अनघ! तदनन्तर एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर हमलोग एक-दूसरेसे मिलेंगे। भगवन्! ये तीनों पुर जब एकत्र होकर एकीभावको प्राप्त हो जाय, उस समय जो एक ही बाणसे इन तीनों पुरोंको नष्ट कर सके, वही देवेश्वर हमारी मृत्युका कारण होगा
tato varṣasahasre tu sameṣyāmaḥ parasparam | ekībhāvaṃ gamiṣyanti purāṇy etāni cānagha, nibodha manasā cātra na te kāryā vicāraṇā |
தைத்யர்கள் கூறினர்— “ஓ குற்றமற்றவரே! பின்னர் ஆயிரம் ஆண்டுகள் நிறைவுற்றபின் நாங்கள் ஒருவரையொருவர் சந்திப்போம். அப்போது இந்த மூன்று புரங்களும் ஒன்றாகச் சேர்ந்து ஒருமையடையும். அந்த வேளையில் ஒரே அம்பால் திரிபுரத்தை அழிக்க வல்ல தேவாதிபதியே எங்கள் மரணக் காரணமாகட்டும்.”
दुर्योधन उवाच