भीष्म-युधिष्ठिर-संमर्दः
Bhīṣma’s Pressure on Yudhiṣṭhira; Śikhaṇḍī’s Approach; Evening Withdrawal
कर्णस्य मतमास्थाय सौबलस्य च यत् पुरा । अचिन्त्य पाण्डवान् कामाद् यथेष्टं कृतवानसि,“पहले कर्ण और शकुनिके बहकावेमें आकर पाण्डवोंको कुछ भी न गिनते हुए जो तूने इच्छानुसार मनमाना बर्ताव किया है, भगवान् श्रीकृष्ण संधिके लिये प्रार्थना करने आये थे, परंतु तूने मोहवश जो उनका भी तिरस्कार किया और बड़े हर्षमें भरकर उलूकके द्वारा जो तूने यह संदेश दिया था कि तुम मुझे और मेरे भाइयोंको मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो, उसके अनुसार तुझे भाइयों तथा सगे-सम्बन्धियोंसहित अवश्य मार डालूँगा। पहले तूने जो- जो पाप किये हैं, उन सबका बदला चुकाकर बराबर कर दूँगा”
karṇasya matam āsthāya saubalasya ca yat purā | acintya pāṇḍavān kāmād yatheṣṭaṁ kṛtavān asi |
சஞ்சயன் கூறினான்—முன்பு கர்ணனும் சௌபலனும் (சகுனி) கூறிய ஆலோசனையை ஏற்று, ஆசையால் உந்தப்பட்டு, பாண்டவர்களை பொருட்படுத்தாமல் நீ விருப்பம்போல் நடந்தாய்.
संजय उवाच