भीष्मपर्व — अध्याय ७२: सैन्यगुणवर्णनम्, व्यूहरक्षा, दैव-पुरुषकारचिन्ता
(अजातशत्रुः शत्रूणां मनांसि समकम्पयत् । श्येनवद् व्यूहय तं व्यूहं धौम्यस्य वचनात् स्वयम् ।। स हि तस्य सुविज्ञात अग्निचित्येषु भारत । मकरस्तु महाव्यूहस्तव पुत्रस्य धीमत: ।। स्वयं सर्वेण सैन्येन द्रोणेनानुमतस्तदा । यथाव्यूहं शान्तनव: सो<न्ववर्तत तत् पुनः ।।) स निर्ययौ महाराज पिता देवब्रतस्तव । महता रथवंशेन संवृतो रथिनां वर:,स्वयं अजातशत्रु युधिष्ठिरने धौम्य मुनिकी आज्ञासे श्येनव्यूहकी रचना करके शत्रुओंके हृदयमें कँपकँपी पैदा कर दी। भारत! अग्निचयनसम्बन्धी कर्मोमें रहते हुए उन्हें श्येनव्यूहका विशेष परिचय था। आपके बुद्धिमान् पुत्रकी सेनाका मकर नामक महाव्यूह निर्मित हुआ था। द्रोणाचार्यकी अनुमति लेकर उसने स्वयं सारी सेनाके द्वारा उस व्यूहकी रचना की थी। फिर शान्तनुनन्दन भीष्मने व्यूहकी विधिके अनुसार निर्मित हुए उस महाव्यूहका स्वयं भी अनुसरण किया था। महाराज! रथियोंमें श्रेष्ठ आपके ताऊ भीष्म विशाल रथसेनासे घिरे हुए युद्धके लिये निकले
sa niryayau mahārāja pitā devabratas tava | mahatā rathavaṃśena saṃvṛto rathināṃ varaḥ ||
சஞ்சயன் கூறினான்—பின்பு, மகாராஜா, ரதவீரர்களில் தலைசிறந்த உன் தந்தை தேவவ்ரதன், சாந்தனுவின் புதல்வன் பீஷ்மன், பெரும் ரதக்கூட்டத்தால் சூழப்பட்டவனாய் போருக்குப் புறப்பட்டான்.
संजय उवाच
The verse highlights the ethical weight of leadership in war: the army’s movement is anchored in a figure of established discipline and authority (Bhīṣma). Even amid violence, conduct is framed by duty (kṣatriya-dharma) and ordered action rather than mere impulse.
Sañjaya reports to Dhṛtarāṣṭra that Bhīṣma (Devavrata), the foremost chariot-warrior and Kuru patriarch, rides out to battle, surrounded by a large chariot contingent—signaling the Kaurava host’s organized advance under his command.