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Shloka 11

Guṇa-traya-vibhāga-yoga (त्रिगुणविभागयोग) — The Analysis of the Three Guṇas

५१, ५२) इनमें शम्भु अर्थात्‌ शंकर सबके अधीश्वर (राजा) हैं तथा कल्याणप्रदाता और कल्याणस्वरूप हैं। इसलिये उन्हें भगवान्‌ने अपना स्वरूप कहा है। २. धर, ध्रुव, सोम, अह:, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास--इन आठोंको वसु कहते हैं-- धरो ध्रुवश्च सोमश्न अहश्वैवानिलोडनल: । प्रत्यूषश्न प्रभासश्न॒ वसवोषूष्टौ प्रकीर्तिता: ।। (महा०, आदि० ६६।१८) इनमें अनल (अग्नि) वसुओंके राजा हैं और देवताओंको हवि पहुँचानेवाले हैं। इसके अतिरिक्त वे भगवानके मुख भी माने जाते हैं। इसीलिये अग्नि (पावक)-को भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। 3. समस्त नक्षत्र सुमेरु पर्वतकी परिक्रमा करते हैं और सुमेरु पर्वत नक्षत्र और द्वीपोंका केन्द्र तथा सुवर्ण और रत्नोंका भण्डार माना जाता है तथा उसके शिखर अन्य पर्वतोंकी अपेक्षा ऊँचे हैं। इस प्रकार शिखरवाले पर्वतोंमें प्रधान होनेसे सुमेरको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ४. बृहस्पति देवराज इन्द्रके गुरु, देवताओंके कुलपुरोहित और विद्या-बुद्धिमें सर्वश्रेष्ठ हैं तथा संसारके समस्त पुरोहितोंमें मुख्य और अंगिरसोंके राजा माने गये हैं। इसलिये भगवान्‌ने उनको अपना स्वरूप कहा है। ५. स्कन्दका दूसरा नाम कार्तिकेय है। इनके छः: मुख और बारह हाथ हैं। ये महादेवजीके पुत्र और देवताओंके सेनापति हैं। कहीं-कहीं इन्हें अग्निके तेजसे तथा दक्षकन्या स्वाहाके द्वारा उत्पन्न माना गया है (महाभारत, वनपर्व २२३)। इनके सम्बन्धमें महाभारत और पुराणोंमें बड़ी ही विचित्र-विचित्र कथाएँ मिलती हैं। संसारके समस्त सेनापतियोंमें ये प्रधान हैं, इसीलिये भगवानने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। ६. महर्षि बहुत-से हैं, उनके लक्षण और उनमेंसे प्रधान दसके नाम ये हैं-- ईश्वरा: स्वयमुद्धूता मानसा ब्रह्मण: सुता: । यस्मान्न हन्यते मानैर्महान्‌ परिगत: पुर: ।। यस्मादृषन्ति ये धीरा महान्तं सर्वतो गुणै: । तस्मान्महर्षय: प्रोक्ता बुद्धेः परमदर्शिन: ।। भृगुर्मरीचिरत्रिश्व अंगिरा: पुलह: क्रतुः । मनुर्दक्षो वसिष्ठश्न॒ पुलस्त्यश्वेति ते दश ।। ब्रह्मणो मानसा होत उद्धूता: स्वयमी श्वरा: । प्रवर्तत ऋषेर्यस्मान्महांस्तस्मान्महर्षय: ।। (वायुपुराण ५९।८२-८३, ८९-९०) “ब्रह्माके ये मानस पुत्र ऐश्वर्यवान्‌ (सिद्धियोंसे सम्पन्न) एवं स्वयं उत्पन्न हैं। परिमाणसे जिसका हनन न हो (अर्थात्‌ जो अपरिमेय हो) और जो सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी सामने (प्रत्यक्ष) हो, वही महान्‌ है। जो बुद्धिके पार पहुँचे हुए (भगवत्प्राप्त) विज्ञजन गुणोंके द्वारा उस महान्‌ (परमेश्वर)-का सब ओरसे अवलम्बन करते हैं, वे इसी कारण (“महान्तम्‌ ऋषन्ति इति महर्षय:” इस व्युत्पत्तिके अनुसार) महर्षि कहलाते हैं। भूगु, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, मनु, दक्ष, वसिष्ठ और पुलस्त्य--ये दस महर्षि हैं। ये सब ब्रह्माके मनसे स्वयं उत्पन्न हुए हैं और ऐश्वर्यवान्‌ हैं। चूँकि ऋषि (ब्रह्माजी)-से इन ऋषियोंके रूपमें स्वयं महान्‌ (परमेश्वर) ही प्रकट हुए, इसलिये ये महर्षि कहलाये।” महर्षियोंमें भूगुजी मुख्य हैं। ये भगवानके भक्त, ज्ञानी और बड़े तेजस्वी हैं; इसीलिये इनको भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है। $. किसी अर्थका बोध करानेवाले शब्दको 'गी:” (वाणी) कहते हैं और ओंकार (प्रणव)-को “एक अक्षर कहते हैं (गीता ८।१३)। जितने भी अर्थबोधक शब्द हैं, उन सबमें प्रणवकी प्रधानता है; क्योंकि “प्रणव" भगवानका नाम है (गीता १७।२३)। प्रणवके जपसे भगवानकी प्राप्ति होती है। नाम और नामीमें अभेद माना गया है। इसलिये भगवानने “प्रणव” को अपना स्वरूप बतलाया है। २. जपयज्ञमें हिंसाका सर्वधा अभाव है और जपयज्ञ भगवानका प्रत्यक्ष करानेवाला है। मनुस्मृतिमें भी जपयज्ञकी बहुत प्रशंसा की गयी है-- विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिग्गुणै: | उपांशु: स्पाच्छतगुण: साहस्रो मानस: स्मृत: ।। (२।८५) “विधियज्ञसे जपयज्ञ दसगुना, उपांशुजप सौगुना और मानसजप हजारगुना श्रेष्ठ कहा गया है।' इसलिये समस्त यज्ञोंमें जपयज्ञकी प्रधानता है, यह भाव दिखलानेके लिये भगवानने जपयज्ञको अपना स्वरूप बतलाया है। ३. स्थिर रहनेवालोंको स्थावर कहते हैं। जितने भी पहाड़ हैं, सब अचल होनेके कारण स्थावर हैं। उनमें हिमालय सर्वोत्तम है। वह परम पवित्र तपोभूमि है और मुक्तिमें सहायक है। भगवान्‌ नर और नारायण वहीं तपस्या कर चुके हैं। साथ ही, हिमालय सब पर्वतोंका राजा भी है। इसीलिये उसको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ४. पीपलका वृक्ष समस्त वनस्पतियोंमें राजा और पूजनीय माना गया है। पुराणोंमें अश्वत्थका बड़ा माहात्म्य मिलता है। स्कन्दपुराणमें कहा है-- स एव विष्णुर्द्रम एव मूर्तो महात्मभि: सेवितपुण्यमूल: । यस्याश्रय: पापसहख्रहन्ता भवेन्नणां कामदुघो गुणाढ्य: ।। (नागर० २४७।४४) “यह वृक्ष मूर्तिमान्‌ श्रीविष्णुस्वरूप है; महात्मा पुरुष इस वृक्षके पुण्यमय मूलकी सेवा करते हैं। इसका गुणोंसे युक्त और कामनादायक आश्रय मनुष्योंके हजारों पापोंका नाश करनेवाला है।” इसलिये भगवान्‌ने इसको अपना स्वरूप बतलाया है। ५. देवर्षिके लक्षण इसी अध्यायके बारहवें, तेरहवें श्लोकोंकी टिप्पणीमें दिये गये हैं, उन्हें वहाँ पढ़ना चाहिये। ऐसे देवर्षियोंमें नारदजी सबसे श्रेष्ठ हैं। साथ ही वे भगवानके परम अनन्य भक्त, महान्‌ ज्ञानी और निपुण मन्त्रद्रष्टा हैं। इसीलिये नारदजीको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ६. गन्धर्व एक देवयोनिविशेष है; ये देवलोकमें गान, वाद्य और नाट्याभिनय किया करते हैं। स्वर्गमें ये सबसे सुन्दर और अत्यन्त रूपवान्‌ माने जाते हैं। “गुह्मक-लोक” से ऊपर और “विद्याधर-लोक' से नीचे इनका “गन्धर्व-लोक' है। देवता और पितरोंकी भाँति गन्धर्व भी दो प्रकारके होते हैं--मर्त्य और दिव्य। जो मनुष्य मरकर पुण्यबलसे गन्धर्वलोकको प्राप्त होते हैं, वे 'मर्त्य” हैं और जो कल्पके आरम्भसे ही गन्धर्व हैं, उन्हें “दिव्य” कहते हैं। दिव्य गन्धरवोंकी दो श्रेणियाँ हैं--'मौनेय” और “प्राधेय”। महर्षि कश्यपकी दो पत्नियोंके नाम थे--मुनि और प्राधा। इन्हींसे अधिकांश अप्सराओं और गन्धर्वोंकी उत्पत्ति हुई। चित्ररथ दिव्य संगीतविद्याके पारदर्शी और अत्यन्त ही निपुण हैं। इसीसे भगवानने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। ७. जो सर्व प्रकारकी स्थूल और सूक्ष्म जगत्‌की सिद्धियोंको प्राप्त हों तथा धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य और वैराग्य आदि श्रेष्ठ गुणोंसे पूर्णतया सम्पन्न हों, उनको सिद्ध कहते हैं। ऐसे हजारों सिद्ध हैं, जिनमें भगवान्‌ कपिल सर्वप्रधान हैं। भगवान्‌ कपिल साक्षात्‌ ईश्वरके अवतार हैं। इसीलिये भगवानने समस्त सिद्धोंमें कपिल मुनिको अपना स्वरूप बतलाया है। ८. बहुत-से हाथियोंमें जो श्रेष्ठ हो, उसे गजेन्द्र कहते हैं। ऐसे गजेन्द्रोंमें भी ऐरावत हाथी, जो इन्द्रका वाहन है, सर्वश्रेष्ठ और “गज” जातिका राजा माना गया है। इसकी उत्पत्ति भी उच्चै:श्रवा घोड़ेंकी भाँति समुद्रमन्थनसे ही हुई थी। इसलिये इसको भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है। $. शास्त्रोक्त लक्षणोंसे युक्त धर्मपरायण राजा अपनी प्रजाको पापोंसे हटाकर धर्ममें प्रवृत्त करता है और सबकी रक्षा करता है, इस कारण अन्य मनुष्योंसे राजा श्रेष्ठ माना गया है। ऐसे राजामें भगवान्‌की शक्ति साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा अधिक रहती है। इसीलिये भगवानने राजाको अपना स्वरूप कहा है। २. जितने भी शस्त्र हैं, उन सबमें वज्र अत्यन्त श्रेष्ठ है; क्योंकि वजमें दधीचि ऋषिके तपका तथा साक्षात्‌ भगवान्‌का तेज विराजमान है और उसे अमोघ माना गया है (श्रीमद्धागवत ६

arjuna uvāca | kathayāmi te 'haṁ śṛṇu me vibhūtīr divyā hy ātma-vibhūtayaḥ | (atra gītā-press-pāṭhe śloka-saṅkhyā 11 iti nirdiṣṭaḥ, kintu pradatta-pāṭhaḥ vyākhyātmaka-ṭīkā-rūpaḥ—vibhūti-yoga-vyākhyānaṁ: śambhuḥ, analaḥ, sumeruḥ, bṛhaspatiḥ, skandaḥ, bhṛguḥ, praṇavaḥ, japa-yajñaḥ, himālayaḥ, aśvatthaḥ, nāradaḥ, citrarathaḥ, kapilaḥ, airāvataḥ, rājā, vajraṁ ity-ādi.)

இது ‘விபூதி’ போதனையின் விளக்கக் குறிப்பு: ஒவ்வொரு வகையிலும் மிகச் சிறந்ததும், நன்மை தருவதும், தர்மத்தை காக்குவதும் எதுவோ அதையே ஆண்டவன் தன் வெளிப்பாடாகச் சுட்டுகிறார்—அதிபதிகளிலும் நன்மை வழங்குவோரிலும் ஷம்பு (சங்கரன்), வசுக்களில் அக்னி, மலைச் சிகரங்களில் சுமேரு, புரோகித-ஆசாரியர்களில் ப்ருஹஸ்பதி, சேனாதிபதிகளில் ஸ்கந்தன், மகரிஷிகளில் ப்ருகு, சொற்களில் பிரணவம் (ஓம்), யாகங்களில் ஜபயாகம், நிலைபெற்றவற்றில் ஹிமாலயம், மரங்களில் அஷ்வத்தம், தேவரிஷிகளில் நாரதர், கந்தர்வர்களில் சித்ரரதன், சித்தர்களில் கபிலர், யானைகளில் ஐராவதம், மனிதர்களில் தர்மபராயண அரசன், ஆயுதங்களில் வஜ்ரம். நெறிப்பொருள்—பாதுகாக்கவும் உயர்த்தவும் கற்பிக்கவும் வழிநடத்தவும் செய்கிற சிறப்பை உலகில் தெய்வீக இருப்பின் விபூதியாக அறிதல் வேண்டும்.

धरोDhara (a Vasu)
धरो:
Karta
TypeNoun
Rootधर
FormMasculine, Nominative, Singular
ध्रुवःDhruva (a Vasu)
ध्रुवः:
Karta
TypeNoun
Rootध्रुव
FormMasculine, Nominative, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
सोमःSoma (a Vasu)
सोमः:
Karta
TypeNoun
Rootसोम
FormMasculine, Nominative, Singular
अहःAhaḥ (Day; a Vasu)
अहः:
Karta
TypeNoun
Rootअहन्/अहः
FormNeuter, Nominative, Singular
एवindeed/just
एव:
TypeIndeclinable
Rootएव
अनिलःAnila (Wind; a Vasu)
अनिलः:
Karta
TypeNoun
Rootअनिल
FormMasculine, Nominative, Singular
अनलःAnala (Fire; a Vasu)
अनलः:
Karta
TypeNoun
Rootअनल
FormMasculine, Nominative, Singular
प्रत्यूषःPratyūṣa (Dawn; a Vasu)
प्रत्यूषः:
Karta
TypeNoun
Rootप्रत्यूष
FormMasculine, Nominative, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
प्रभासःPrabhāsa (Splendour; a Vasu)
प्रभासः:
Karta
TypeNoun
Rootप्रभास
FormMasculine, Nominative, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
वसवःthe Vasus
वसवः:
Karta
TypeNoun
Rootवसु
FormMasculine, Nominative, Plural
अष्टौeight
अष्टौ:
TypeNumeral
Rootअष्टन्
FormMasculine, Nominative, Plural
प्रकीर्तिताःare proclaimed/are said (to be)
प्रकीर्तिताः:
TypeAdjective
Rootप्र-कीर्तित
FormMasculine, Nominative, Plural

अजुन उवाच

A
Arjuna
Ś
Śambhu (Śiva/Śaṅkara)
V
Vasus
A
Anala/Agni/Pāvaka
S
Sumeru (Mount Meru)
B
Bṛhaspati
S
Skanda/Kārtikeya
M
Mahārṣis
B
Bhṛgu
P
Praṇava (Oṁ)
J
Japa-yajña
H
Himālaya
A
Aśvattha (Peepal tree)
D
Devarṣi
N
Nārada
G
Gandharvas
C
Citraratha
S
Siddhas
K
Kapila
A
Airāvata
I
Indra
R
Rājā (righteous king)
V
Vajra (thunderbolt)

Educational Q&A

The divine can be recognized through ‘vibhūtis’—the most excellent, beneficial, and dharma-supporting exemplars within each category. By contemplating such peak instances (teacher among teachers, mountain among mountains, mantra among words, non-violent japa among sacrifices), one learns to see the Lord’s presence immanent in the world and to value what protects, purifies, and guides.

In the Bhīṣma Parva’s Bhagavadgītā context, Arjuna and Kṛṣṇa are on the battlefield; the discourse turns to identifying the Lord’s manifestations. The provided text is a Gita Press-style explanatory note listing and justifying why particular figures (Śiva, Agni, Meru, Bṛhaspati, Skanda, Bhṛgu, Oṁ, japa, Himālaya, Aśvattha, Nārada, Citraratha, Kapila, Airāvata, the righteous king, and the vajra) are singled out as representative divine excellences.