अक्षरब्रह्मयोगः | Akṣara-Brahma-Yoga
The Yoga of the Imperishable Brahman
सम्बन्ध-- अब दो श्लोकोर्में उसी स्थितिकी प्राप्तिके लिये अभेदरूपसे परमात्माके ध्यानयोगका साधन करनेकी रीति बतलाते हैं-- संकल्पप्रभवान् कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषत: । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः,संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंको नि:ःशेषरूपसे त्यागकर्रा और मनके द्वारा इन्द्रियोंके समुदायको सभी ओरसे भलीभाँति रोककर£४। क्रम- क्रमसे अभ्यास करता हुआ उपरतिको प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा मनको परमात्मामें स्थित करके परमात्माके सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे
arjuna uvāca | saṅkalpaprabhavān kāmāṁs tyaktvā sarvān aśeṣataḥ | manasaivendriyagrāmaṁ viniyamya samantataḥ ||
சங்கல்பத்திலிருந்து எழும் எல்லா ஆசைகளையும் முற்றிலும் துறந்து, மனத்தினாலேயே இంద్రியக் கூட்டத்தை எல்லாத் திசைகளிலும் நன்கு கட்டுப்படுத்தி.
अर्जुन उवाच