ध्यानयोगः — Dhyāna-Yoga
Discipline of Meditation and Mental Restraint
पहले भी जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये थे और जो मुझमें अनन्यप्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहनेवाले बहुत-से भक्त उपर्युक्त ज्ञानरूप तपसे पवित्र होकर मेरे स्वरूपको प्राप्त हो चुके हैं ।। ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वत्मनिवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:,हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ;* क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गकका अनुसरण करते हैं;
ye yathā māṁ prapadyante tāṁs tathaiva bhajāmy aham | mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||
பார்த்தா! மக்கள் எந்த முறையில் என்னைச் சரணடைகிறார்களோ, அதே முறையில் நானும் அவர்களை ஏற்றுக் கொள்கிறேன்; ஏனெனில் மனிதர்கள் எல்லா வழிகளிலும் என் பாதையையே பின்பற்றுகின்றனர்.
अजुन उवाच