धृतराष्ट्रस्य पाण्डवेषु प्रीति-वृत्तान्तः | Dhṛtarāṣṭra’s Affectionate Disposition toward the Pāṇḍavas
अहमप्युपवत्स्यामि यथैवायं गुरुर्मम । यदि राजा न भुद्धक्तेड्यं गान्धारी च यशस्विनी,प्रोवाचेदं सुसंरब्धो भीम: स परुषं वच: । राजा धृतराष्ट्रकी जो दुष्टतापूर्ण मन्त्रणाएँ होती थीं और तदनुसार ही जो उनके कई दुर्बर्ताव हुए थे, उन्हें सदा भीमसेन याद रखते थे। एक दिन अमर्षमें भरे हुए भीमसेनने अपने मित्रोंके बीचमें बारंबार अपनी भुजाओंपर ताल ठोंका और धुृतराष्ट्र एवं गान्धारीको सुनाते हुए रोषपूर्वक यह कठोर वचन कहा। वे अपने शत्रु दुर्योधन, कर्ण और दुःशासनको याद करके यों कहने लगे-- यदि यशस्विनी गान्धारी देवी और राजा धुृतराष्ट्र भोजन नहीं करते हैं तो अपने इन गुरुजनोंकी भाँति मैं भी उपवास करूँगा
vaiśampāyana uvāca | aham apy upavatsyāmi yathaivāyaṃ gurur mama | yadi rājā na bhuṅkte 'dyaṃ gāndhārī ca yaśasvinī | provācedaṃ susaṃrabdho bhīmaḥ sa paruṣaṃ vacaḥ |
நானும் என் இந்த மூத்தவரைப் போலவே உபவாசம் இருப்பேன். இன்று அரசன் துருதராஷ்டிரனும் புகழ்மிக்க காந்தாரியும் உணவு கொள்ளாவிட்டால், நானும் இந்தப் போற்றத்தக்க மூப்பர்களைப் போல உபவாசம் செய்வேன்।
वैशम्पायन उवाच