'राजन्! जो किसीकी निन्दा या अपराध न करे, उसे मार देना अन्याय है, तथापि मैं आपके इस कार्यकी निन्दा नहीं करता; क्योंकि बलवान् राजाको प्राय: शीघ्र ही ऐसे कठोर कर्म करनेका अवसर प्राप्त हो जाता है' ।। वैशम्पायन उवाच शोणिते तु व्यतिक्रान्ते प्रविवेश बृहन्नला । अभिवाद्य विराट तु कड़॒कं चाप्युपतिछ्तत,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! जब युधिष्ठिरकी नाकसे रक्त बहना बंद हो गया, उस समय बृहन्नलाने राजसभामें प्रवेश किया। उसने विराटको नमस्कार करके कंकको भी प्रणाम किया
vaiśampāyana uvāca | śoṇite tu vyatikrānte praviveśa bṛhannalā | abhivādya virāṭaṃ tu kaṅkaṃ cāpy upatiṣṭhat ||
वैशम्पायन उवाच— शोणिते तु व्यतिक्रान्ते प्रविवेश बृहन्नला । अभिवाद्य विराटं तु कङ्कं चाप्युपतस्थिवान् ॥
वैशम्पायन उवाच