Adhyāya 6: Kaṅka (Yudhiṣṭhira) Seeks Refuge in Virāṭa’s Assembly
अपर अपर हूँ... अपर-क पा - पाण्डवलोग शव बँधी हुई शाखाकी ओर अँगुलीसे संकेत करके कहते थे--“यह हमारी माता है।' वे अपने आयुधोंकी रक्षा करनेके कारण शमीको ही अपनी माता मानते थे और उसीकी ओर उनका वास्तविक संकेत था। शव- बन्धनके व्याजसे वे अस्त्र-संरक्षणको ही पूर्वजोंद्वारा आचरित कुलधर्म घोषित करते थे। षष्ठो5 ध्याय: युधिष्ठिरद्वारा दुगदिवीकी स्तुति और देवीका प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन्हें वर देना वैशम्पायन उवाच विराटनगरं रम्यं गच्छमानो युधिष्ठिर: । अस्तुवन्मनसा देवी दुर्गा त्रिभुवनेश्वरीम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! विराटके रमणीय नगरमें प्रवेश करते समय महाराज युधिष्ठिरने मन-ही-मन त्रिभुवनकी अधीश्वरी दुर्गदिवीका इस प्रकार स्तवन किया--
Vaiśampāyana uvāca | virāṭanagaraṁ ramyaṁ gacchamāno yudhiṣṭhiraḥ | astuvan manasā devīṁ durgāṁ tribhuvaneśvarīm ||
वैशम्पायन उवाच—राजन्! पाण्डवाः शवबद्धशाखां प्रति अङ्गुल्या संकेतं कृत्वा वदन्ति स्म—“एषा अस्माकं माता” इति। आयुधरक्षणहेतोः शमीमेव मातृवत् मन्यमानाः तामेव वास्तवतया निर्दिशन्ति स्म। शवबन्धनव्याजेन तेऽस्त्रसंरक्षणमेव पूर्वैः आचरितं कुलधर्मं प्रख्यापयन्ति स्म। अथ षष्ठोऽध्यायः—विराटनगरं रम्यं गच्छमानो युधिष्ठिरो मनसा त्रिभुवनेश्वरीं दुर्गां देवीं स्तोतुं प्रववृते।
वैशम्पायन उवाच
Even in political danger and concealment, one should uphold dharma through self-control and seek strength through inner devotion; prayer here functions as ethical steadiness rather than escapism.
As the Pāṇḍavas approach Virāṭa’s city during their incognito year, Yudhiṣṭhira silently offers a hymn to Goddess Durgā, asking for protection and success in maintaining their vow of secrecy.