
Agastya’s Encounter with Ilvala and Vātāpi; Dāna, Progeny, and the Renown of Agastya-Āśrama
Upa-parva: Agastya–Ilvala–Vātāpi Upākhyāna (Episode of Agastya and the Asura Brothers)
Lomāśa recounts how Ilvala, accompanied by ministers, receives visiting royal sages and offers hospitality through a prepared meal involving his brother Vātāpi in ram-form. The assembled sages are distressed upon recognizing the stratagem, but Agastya reassures them and consumes Vātāpi completely. When Ilvala attempts to summon Vātāpi back, the attempt fails; Ilvala, seeing the outcome, becomes subdued. Ilvala then inquires the purpose of the visit. Agastya, with controlled irony, acknowledges Ilvala’s lordship and requests wealth: cattle and gold for the attending kings, and a greater allotment for himself, including a golden chariot with swift horses. The request is verified and granted, and the wealth is rapidly conveyed to Agastya’s āśrama; the royal sages depart with Agastya’s permission. The narrative shifts to Lopāmudrā requesting a single, highly capable son. Agastya discusses options—many sons or one equal to many—and accepts her preference. After conception, Agastya returns to the forest; the child develops over seven years and is born as Dṛḍhasyu, radiant and Veda-reciting, later known for carrying firewood (idhmavāha), pleasing his father and benefiting ancestors. The chapter closes by noting the celebrated, flower-rich āśrama of Agastya and inviting immersion in the sacred Bhāgīrathī.
Chapter Arc: तीर्थयात्रा के प्रसंग में लोमश ऋषि अगस्त्य-महर्षि की कथा उठाते हैं—कैसे गंगाद्वार के तपस्वी, जिनका तेज शापाग्नि-सा है, गृहस्थ-धर्म की ओर एक असाधारण मांग लेकर विदर्भ-राज के द्वार पर आते हैं। → अगस्त्य स्पष्ट कहते हैं कि पुत्र-कारण से वे विवाह चाहते हैं और राजा से लोपामुद्रा को मांगते हैं। विदर्भ-नरेश स्तब्ध—न अस्वीकार कर पाते हैं, न सहजता से दे पाते हैं; भय है कि क्रुद्ध महर्षि शाप से भस्म कर देंगे। राजा रानी से परामर्श करता है, और राजकुल की मर्यादा बनाम ऋषि-आज्ञा का द्वंद्व तीखा होता जाता है। → लोपामुद्रा स्वयं आगे बढ़कर पिता को धैर्य देती है—‘मेरे कारण पीड़ा न मानो; मुझे अगस्त्य को दे दो।’ फिर वह अगस्त्य के सामने लज्जा और प्रेम सहित अपनी शर्त रखती है: वह जीर्ण काषाय-वस्त्रों में उपेक्षित जीवन नहीं चाहती, पर उनके धर्म का लोप भी नहीं चाहती—अर्थात् गृहस्थ-आनंद और धर्म, दोनों का संतुलन। → अगस्त्य लोपामुद्रा की बुद्धि-निश्चित इच्छा स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि वह उसकी कामना की पूर्ति हेतु धन/सम्पदा अर्जित करने निकलेंगे; लोपामुद्रा को आश्रम में ठहरने का निर्देश देकर वे प्रयोजन-सिद्धि के लिए प्रस्थान का संकल्प लेते हैं। → अगस्त्य ‘हर्तु गच्छामि’ कहकर निकल पड़ते हैं—अब प्रश्न यह है कि तपस्वी ऋषि किस प्रकार और किनसे वह वैभव प्राप्त करेंगे जिससे लोपामुद्रा की मर्यादा-युक्त कामना पूरी हो सके।
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ “लोक मिलाकर कुल ३०३६ “लोक हैं] ८-० 05० () अत मा सप्तनवतितमो< ध्याय: महर्षि अगस्त्यका 29255 6 द्रासे विवाह
लोमश उवाच— यदा तु मुनिवरः अगस्त्यः विदर्भराजकन्या गृहस्थधर्मभारवहने समर्थेति ज्ञातवान्, तदा स विदर्भस्य पृथिवीपतिं समभिगम्य प्रोवाच।
Verse 2
राजन निवेशे बुद्धिमें वर्तते पुत्रकारणात् । वरये त्वां महीपाल लोपामुद्रां प्रयच्छ मे
राजन्, पुत्रार्थं गृहस्थाश्रमप्रवेशे मे निश्चयो वर्तते। तस्मात्, महीपाल, तव दुहितरं लोपामुद्रां वरे; तां मे प्रयच्छ।
Verse 3
एवमुक्त: स मुनिना महीपालो विचेतन: । प्रत्याख्यानाय चाशक्तः प्रदातुं चैव नैच्छत,मुनिवर अगस्त्यके ऐसा कहनेपर विदर्भराजके होश उड़ गये। वे न तो अस्वीकार कर सके और न उन्होंने अपनी कन्या देनेकी इच्छा ही की
एवमुक्तः स मुनिना महीपालोऽभवत् विचेतनः। प्रत्याख्यातुं न शक्तश्च प्रदातुं चैव नेच्छति।
Verse 4
ततः स भार्यामभ्येत्य प्रोवाच पृथिवीपति: । महर्षिवीर्यवानेष क्रुद्ध: शापाग्निना दहेत्
ततः स भार्यामभ्येत्य प्रोवाच पृथिवीपतिः— महर्षिर्वीर्यवान् एष; क्रुद्धः शापाग्निना दहेत्।
Verse 5
तं॑ तथा दु:खितं दृष्टवा सभार्य पृथिवीपतिम् । लोपामुद्राभिगम्येदं काले वचनमब्रवीत्,रानीसहित महाराजको इस प्रकार दुःखी देख लोपामुद्रा उनके पास गयी और समयके अनुसार इस प्रकार बोली--
तं तथा दुःखितं दृष्ट्वा सभार्यं पृथिवीपतिम्। लोपामुद्रा समभिगम्य काले वचनमब्रवीत्।
Verse 6
न मत्कृते महीपाल पीडामभ्येतुमहसि । प्रयच्छ मामगस्त्याय त्राह्मात्मानं मया पित:,“राजन! आपको मेरे लिये दुःख नहीं मानना चाहिये। पिताजी! आप मुझे अगस्त्यजीकी सेवामें दे दें और मेरे द्वारा अपनी रक्षा करें”
न मत्कृते महीपाल पीडामभ्येतुमर्हसि । प्रयच्छ मामगस्त्याय त्राह्यात्मानं मया पितः ॥
Verse 7
दुहितुर्वचनाद् राजा सोडगस्त्याय महात्मने । लोपामुद्रां ततः प्रादाद् विधिपूर्व विशाम्पते,युधिष्ठिर! पुत्रीकी यह बात सुनकर राजाने महात्मा अगस्त्यमुनिको विधिपूर्वक अपनी कन्या लोपामुद्रा ब्याह दी
दुहितुर्वचनाद् राजा सोडोऽगस्त्याय महात्मने । लोपामुद्रां ततः प्रादाद् विधिपूर्वं विशाम्पते ॥
Verse 8
प्राप्प भार्यामगस्त्यस्तु लोपामुद्रामभाषत । महाहण्युत्सूजैतानि वासांस्याभरणानि च,लोपामुद्राको पत्नीरूपमें पाकर महर्षि अगस्त्यने उससे कहा--'ये तुम्हारे वस्त्र और आभूषण बहुमूल्य हैं। इन्हें उतार दो”
प्राप्य भार्यामगस्त्यस्तु लोपामुद्रामभाषत । महार्हाण्युत्सृजैतानि वासांसिाभरणानि च ॥
Verse 9
ततः सा दर्शनीयानि महाहाणि तनूनि च । समुत्ससर्ज रम्भोरुर्वसनान्यायतेक्षणा
ततः सा दर्शनीयानि महार्हाणि तनूनि च । समुत्ससर्ज रम्भोरुर्वसनान्यायतलोचना ॥
Verse 10
ततश्लीराणि जग्राह वल्कलान्यजिनानि च । समानव्रतचर्या च बभूवायतलोचना
ततः शीराणि जग्राह वल्कलान्यजिनानि च । समानव्रतचर्या च बभूवायतलोचना ॥
Verse 11
गड्जाद्वारमथागम्य भगवानृषिसत्तम: | उग्रमातिष्ठत तप: सह पत्न्यानुकूलया,तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ भगवान् अगस्त्य अपनी अनुकूल पत्नीके साथ गंगाद्वार (हरिद्वार)- में आकर घोर तपस्यामें संलग्न हो गये
गङ्गाद्वारमथागम्य भगवानृषिसत्तमः । उग्रमातिष्ठत तपः सह पत्न्यानुकूलया ॥
Verse 12
सा प्रीता बहुमानाच्च पतिं पर्यचरत् तदा । अगस्त्यश्न परां प्रीतिं भार्यायामचरत् प्रभु:
सा प्रीता बहुमानाच्च पतिं पर्यचरत् तदा । अगस्त्यश्च परां प्रीतिं भार्यायामचरत् प्रभुः ॥
Verse 13
ततो बहुतिथे काले लोपामुद्रां विशाम्पते । तपसा द्योतितां स््नातां ददर्श भगवानृषि:
ततो बहुतिथे काले लोपामुद्रां विशाम्पते । तपसा द्योतितां स्नातां ददर्श भगवानृषिः ॥
Verse 14
स तस्या: परिचारेण शौचेन च दमेन च । श्रिया रूपेण च प्रीतो मैथुनायाजुहाव ताम्
स तस्याः परिचारेण शौचेन च दमेन च । श्रिया रूपेण च प्रीतो मैथुनायाजुहाव ताम् ॥
Verse 15
ततः सा प्राञ्जलि र्भूत्वा लज्जमानेव भाविनी । तदा सप्रणयं वाक्यं भगवन्तमथाब्रवीत्,तब अनुरागिणी लोपामुद्रा कुछ लज्जित-सी हो हाथ जोड़कर बड़े प्रेमसे भगवान् अगस्त्यसे बोली--
ततः सा प्राञ्जलिर्भूत्वा लज्जमानेव भाविनी । तदा सप्रणयं वाक्यं भगवन्तमथाब्रवीत् ॥
Verse 16
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्योपाख्यानविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
असंशयं प्रजाहेतोर्भार्या पतिरविन्दत । या तु त्वयि मम प्रीतिस्तामृषे कर्तुमर्हसि ॥
Verse 17
यथा पितुर्ग॒हे विप्र प्रासादे शयनं मम । तथाविधे त्वं शयने मामुपैतुमिहाहसि,“ब्रह्मन! मैं अपने पिताके घर उनके महलमें जैसी शय्यापर सोया करती थी, वैसी ही शय्यापर आप मेरे साथ समागम करें
यथा पितुर्गृहे विप्र प्रासादे शयनं मम । तथाविधे त्वं शयने मामुपैतुमिहार्हसि ॥
Verse 18
इच्छामि त्वां स्रग्विणं च भूषणैश्न विभूषितम् । उपसर्तु यथाकामं दिव्याभरणभूषिता
इच्छामि त्वां स्रग्विणं च भूषणैश्च विभूषितम् । उपसर्तुं यथाकामं दिव्याभरणभूषिता ॥
Verse 19
, नि जय ध्म_न> |। : हु 3 या ५१० अन्यथा नोपतिष्ठेयं चरिकाषायवासिनी । नैवापवित्रो विप्रर्षे भूषणो5यं कथंचन,“अन्यथा मैं यह जीर्ण-शीर्ण काषाय-वस्त्र पहनकर आपके साथ समागम नहीं करूँगी। ब्रह्म! तपस्वीजनोंका यह पवित्र आभूषण किसी प्रकार सम्भोग आदिके द्वारा अपवित्र नहीं होना चाहिये”
अन्यथा नोपतिष्ठेयं चीरकाषायवासिनी । नैवापवित्रो विप्रर्षे भूषणोऽयं कथंचन ॥
Verse 20
अगस्त्य उवाच न ते धनानि विद्यन्ते लोपामुद्रे तथा मम । यथाविधानि कल्याणि पितुस्तव सुमध्यमे
अगस्त्य उवाच । न ते धनानि विद्यन्ते लोपामुद्रे तथा मम । यथाविधानि कल्याणि पितुस्तव सुमध्यमे ॥
Verse 21
लोपामुद्रोवाच ईशो5सि तपसा सर्व समाहर्तु तपोधन । क्षणेन जीवलोके यद् वसु किंचन विद्यते
लोपामुद्रोवाच— ईशोऽसि तपसा सर्वं समाहर्तुं तपोधन। क्षणेन जीवलोके यद्वसु किंचन विद्यते॥
Verse 22
अगस्त्य उवाच एवमेतद् यथा5<त्थ त्वं तपोव्ययकरं तु तत् । यथा तु मे न नश्येत तपस्तन्मां प्रचोदय
अगस्त्य उवाच— एवमेतद्यथात्थ त्वं तपोव्ययकरं तु तत्। यथा तु मे न नश्येत तपस्तन्मां प्रचोदय॥
Verse 23
लोपामुद्रोवाच अल्पावशिष्ट: कालो<यमृतोर्मम तपोधन । न चान्यथाहमिच्छामि त्वामुपैतुं कथंचन
लोपामुद्रोवाच— अल्पावशिष्टः कालोऽयमृतोर्मम तपोधन। न चान्यथाहमिच्छामि त्वामुपैतुं कथंचन॥
Verse 24
न चापि धर्ममिच्छामि विलोप्तुं ते कथंचन । एवं तु मे यथाकामं सम्पादयितुमहसि
न चापि धर्ममिच्छामि विलोप्तुं ते कथंचन। एवं तु मे यथाकामं सम्पादयितुमर्हसि॥
Verse 25
अगस्त्य उवाच यद्येष काम: सुभगे तव बुद्धया विनिश्चित: । हर्तु गच्छाम्यहं भद्रे चर काममिह स्थिता
अगस्त्य उवाच— यद्येष कामः सुभगे तव बुद्ध्या विनिश्चितः। हर्तुं गच्छाम्यहं भद्रे चर काममिह स्थिता॥
Verse 97
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योपाख्याने सप्तनवतितमो<ध्याय:
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योपाख्याने सप्तनवतितमोऽध्यायः समाप्तः॥
The tension between accepting hospitality and recognizing concealed harm: the sages face a deceptive ‘guest-offering,’ and the episode examines how discernment and disciplined response preserve dharma without panic or retaliatory excess.
Power is ethically legitimate when governed by self-mastery and oriented toward protection and rightful aims; additionally, dāna is framed as a regulated social instrument—requests should be purposeful and non-injurious, and giving should be proportionate and responsible.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter ends with sacral indexing: the renown of Agastya’s āśrama and the invitation to bathe in the Bhāgīrathī function as a pilgrimage marker, implying merit through remembrance and participation in tīrtha practice.
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