
Jayadratha Approaches Draupadī in the Forest (Hospitality, Persuasion, and Reproach)
Upa-parva: Draupadī-haraṇa / Jayadratha Episode (Forest Encounter Sub-cycle)
Vaiśaṃpāyana narrates a courtly-forest encounter: after kings are seated, a ruler (identified as Jayadratha, lord of Sindhu and Sauvīra) inquires about a woman whose speech and appearance have captivated him. Koṭikāśya identifies her as Draupadī (Kṛṣṇā), the honored wife of the five sons of Pāṇḍu and beloved among the Pārthas. Jayadratha enters the (momentarily) unoccupied hermitage and addresses Draupadī with formal inquiries about welfare. Draupadī responds with composed etiquette, affirming Yudhiṣṭhira’s well-being and extending hospitality: water for washing, a seat, and provisions, including an enumerated list of forest game typically associated with sustenance and guest-offerings. Jayadratha acknowledges the meal courtesies but pivots to persuasion, asserting that the exiled Pandavas are diminished in fortune and advising her not to remain attached to those living in hardship. He advances a prosperity-based argument—claiming that prudence avoids a husband who has lost royal splendor—and proposes that Draupadī become his wife to obtain comfort and status. The narration records Draupadī’s rejection: she withdraws with visible displeasure, censures his words, and instructs him to feel shame. The chapter closes with Draupadī verbally countering inducement while awaiting her husbands’ return, emphasizing fidelity and moral boundary-setting.
Chapter Arc: दुर्योधन अपमान और विफलता से जर्जर होकर प्रायोपवेश (आमरण अनशन) का निश्चय करता है; राजसभा के ‘सेनाजीवी’ और राज्यवासी स्तब्ध हैं कि राजा स्वयं को त्यागने चला है। → कर्ण आगे बढ़कर दुर्योधन को रोकता है और कठोर यथार्थ सुनाता है—राजा के राज्य में रहने वाले, राजकीय सेना पर जीविका चलाने वाले, और ‘प्रधाना: पुरुषा:’ (प्रभावशाली जन) यदि क्षुब्ध हों तो शत्रु-वाहिनी तक को हिला सकते हैं; इसलिए राजा का आत्मत्याग राज्य-धर्म के विरुद्ध है। वह कहता है कि पाण्डवों को तुच्छ समझकर बैठना उचित नहीं, पर उन्हें परास्त करने का उपाय पुरुषार्थ, संगठन और नीति से है, न कि आत्मविनाश से। → कर्ण का भावनात्मक और राजनीतिक दबाव चरम पर पहुँचता है—वह दुर्योधन के चरणों में बैठकर प्रतिज्ञा करता है कि यदि राजा उसकी बात न माने तो वह वहीं शुश्रूषा करता रहेगा; यहाँ तक कहता है कि ‘त्वद्विहीनो’ वह जी नहीं सकता। साथ ही वह राज्य के सभी आश्रितों/सेनाजीवियों को एकजुट होकर राजा-हित में यत्न करने का आह्वान करता है और पाण्डवों के शौर्य को स्वीकारते हुए भी उन्हें पराजित करने का संकल्प जगाता है। → दुर्योधन का प्रायोपवेश डगमगाता है; कर्ण उसे राजधर्म—प्रजा, सेना, आश्रितों और मित्रों के प्रति उत्तरदायित्व—की ओर लौटाता है। अध्याय का स्वर आत्मघात से हटकर प्रतिशोध-नीति, संगठन और आगामी संघर्ष की तैयारी पर टिक जाता है। → पाण्डवों को ‘बहुत पहले से दास’ कहकर कर्ण जो दर्पपूर्ण आश्वासन देता है, वह अगले घटनाक्रम की ओर संकेत करता है—क्या दुर्योधन इस उकसावे को नीति में बदलेगा या विनाशकारी हठ में?
Verse 2
सेनाजीवैश्व कौरव्य तथा विषयवासिभि:
सेनाजीवाश्च कौरव्य तथा विषयवासिभिः ।
Verse 3
प्राय: प्रधाना: पुरुषा: क्षोभयन्त्यरिवाहिनीम्
प्रायः प्रधाना पुरुषाः क्षोभयन्त्यरिवाहिनीम् ।
Verse 4
सेनाजीवाश्र ये राज्ञां विषये सन्ति मानवा:
सेनाजीवाश्रये राज्ञां विषये सन्ति मानवाः ।
Verse 5
यद्येवं पाण्डवै राजन् भवद्विषयवासिभि:
यद्येवं पाण्डवै राजन् भवद्विषयवासिभिः, तर्हि पाण्डवानां विषयः स्वविषयवासिभिरेव यथान्यायं विनीयताम्।
Verse 6
न चैतत् साधु यद् राजन् पाण्डवास्त्वां नृपोत्तमम्
न चैतत् साधु यद् राजन् पाण्डवास्त्वां नृपोत्तमम्, एवं व्यवहारयन्ति।
Verse 7
शूराश्ष बलवन्तश्न संयुगेष्वपलायिन:
शूराश्च बलवन्तश्च संयुगेष्वपलायिनः।
Verse 8
पाण्डवेयानि रत्नानि त्वमद्याप्युपभुज्जसे
पाण्डवेयानि रत्नानि त्वमद्याप्युपभुज्जसे।
Verse 9
सत्त्वस्थान् पाण्डवान् पश्य न ते प्रायमुपाविशन् । (तदलं ते महाबाहो विषादं कर्तुमीदृूशम् ।) उत्तिष्ठ राजन् भद्रं ते न चिरं कर्तुमहसि
सत्त्वस्थान् पाण्डवान् पश्य न ते प्रायमुपाविशन्। तदलं ते महाबाहो विषादं कर्तुमीदृशम्। उत्तिष्ठ राजन् भद्रं ते न चिरं कर्तुमर्हसि॥
Verse 10
पाण्डवोंके पास जितने रत्न थे, उन सबका उपभोग आज तुम्हीं कर रहे हो; तथापि देखो, पाण्डव कितने धैर्यवान् हैं कि उन्होंने कभी आमरण अनशन नहीं किया। अतः महाबाहो! तुम्हारे इस प्रकार विषाद करनेसे कोई लाभ नहीं है। राजन! उठो, तुम्हारा कल्याण हो। अब यहाँ अधिक विलम्ब नहीं करना चाहिये ।। अवश्यमेव नृपते राज्ञो विषयवासिभि: । प्रियाण्याचरितव्यानि तत्र का परिदेवना,नरेश्वर! राजाके राज्यमें निवास करनेवाले लोगोंको अवश्य ही उसके प्रिय कार्य करने चाहिये। अत: इसके लिये पछताने या विलाप करनेकी क्या बात है?
कर्ण उवाच—पाण्डवानां ये रत्नसमूहा आसन्, तेषां सर्वेषां भोगं त्वमेव अद्य करोषि; तथापि पश्य, पाण्डवाः कियन्तः धैर्यवन्तः—ते कदापि प्रायोपवेशनं न कृतवन्तः। अतः महाबाहो, एवं विषादेन न किञ्चित् फलम्। राजन्, उत्तिष्ठ; तव कल्याणं भवतु। अत्रातिविलम्बो न कर्तव्यः। अवश्यमेव नृपते, राज्ञो विषयवासिभिः प्रियाण्याचरितव्यानि; तत्र का परिदेवना, नरेश्वर?
Verse 11
मद्वाक्यमेतद् राजेन्द्र यद्येवं न करिष्यसि । स्थास्यामीह भवत्पादौ शुश्रूषन्नरिमर्दन,शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले महाराज! यदि तुम मेरी यह बात नहीं मानोगे तो मैं भी तुम्हारे चरणोंकी सेवा करता हुआ यहीं रह जाऊँगा
कर्ण उवाच—मद्वाक्यमेतद् राजेन्द्र यद्येवं न करिष्यसि। स्थास्यामीह भवत्पादौ शुश्रूषन् अरिमर्दन॥
Verse 12
नोत्सहे जीवितुमहं त्वद्विहीनो नररषभ । प्रायोपविष्टस्तु नृप राज्ञां हास्यो भविष्यसि,नरश्रेष्ठ! तुमसे अलग होकर मैं जीवित नहीं रहना चाहता। राजन! आमरण अनशनके लिये बैठ जानेपर तुम समस्त राजाओंके उपहासपात्र हो जाओगे
कर्ण उवाच—नोत्सहे जीवितुमहं त्वद्विहीनो नरर्षभ। प्रायोपविष्टस्तु नृप राज्ञां हास्यो भविष्यसि॥
Verse 13
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा । नैवोत्थातुं मनश्नक्रे स्वर्गाय कृतनिश्चय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! कर्णके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने स्वर्गलोकमें ही जानेका निश्चय करके उस समय उठनेका विचार नहीं किया
वैशम्पायन उवाच—एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा। नैवोत्थातुं मनश्चक्रे स्वर्गाय कृतनिश्चयः॥
Verse 16
सद्यो वशं समापन्नः शत्रूणां शत्रुकर्शन | कर्ण बोला--राजन्! आज तुम जो यहाँ इतनी लघुताका अनुभव कर रहे हो, इसका कोई कारण मेरी समझमें नहीं आता। शत्रुनाशक वीर! यदि एक बार शत्रुओंके वशमें पड़ जानेपर पाण्डवोंने तुम्हें छुड़ाया है, तो इसमें कौन अद्भुत बात हो गयी?
कर्ण उवाच—राजन्, अद्य त्वं यदिहैवं लघुतां मन्यसे, तस्य कारणं मे न बोध्यते। शत्रुकर्शन, यदि कदाचित् शत्रूणां वशं समापन्नं त्वां पाण्डवाः मोचितवन्तः, तत्र किमद्भुतम्?
Verse 33
निगृहान्ते च युद्धेषु मोक्ष्यन्ते चैव सैनिकै: । प्राय: देखा जाता है कि प्रधान पुरुष लड़ते-लड़ते शत्रुओंकी सेनाको व्याकुल कर देते हैं। फिर उसी युद्धमें वे बंदी बना लिये जाते हैं और साधारण सैनिकोंकी सहायतासे छूट भी जाते हैं
युद्धेषु प्रधानपुरुषाः प्रायः शत्रुसेनां निगृह्य व्याकुलां कुर्वन्ति; तस्मिन्नेव संग्रामे ते कदाचिद् बद्धा अपि भवन्ति, पुनश्च साधारणसैनिकसहाय्येन मोक्ष्यन्ते।
Verse 46
तैः सड़म्य नृपार्थाय यतितव्यं यथातथम् | जो मनुष्य सेनाजीवी हैं अथवा राजाके राज्यमें निवास करते हैं, उन सबको मिलकर अपने राजाके हितके लिये यथोचित प्रयत्न करना चाहिये
तैः सह राजार्थाय यथायोग्यं यथावस्थं च यतितव्यं; ये च सेनाजीविनो ये च राज्ञो राज्ये निवसन्ति, ते सर्वे मिलित्वा स्वराजहिताय सम्यक् प्रयत्नं कुर्युः।
Verse 53
यदृच्छया मोक्षितो5सि तत्र का परिदेवना | राजन! यदि तुम्हारे राज्यमें निवास करनेवाले पाण्डवोंने इसी नीतिके अनुसार दैववश तुम्हें शत्रुओंके हाथसे छुड़ा दिया है, तो इसमें खेद करनेकी क्या बात है?
यदृच्छया मोक्षितोऽसि तत्र का परिदेवना? राजन्, यदि तव राज्यनिवासिनः पाण्डवाः नीत्यनुसारं दैवयोगात् शत्रुहस्तात् त्वां मोचयामासुः, तत्र खेदस्य किं कारणम्?
Verse 63
स्वसेनया सम्प्रयान्तं नानुयान्ति सम पृष्ठतः । राजन! आप श्रेष्ठ नरेश हैं और अपनी सेनाके साथ वनमें पधारे हैं, ऐसी दशामें यहाँ रहनेवाले पाण्डव यदि आपके पीछे-पीछे न चलते--आपकी सहायता न करते तो यह उनके लिये अच्छी बात न होती
स्वसेनया सम्प्रयान्तं राजानं पृष्ठतो जनाः नानुयान्ति चेत् न युक्तं तत्। राजन्, भवान् श्रेष्ठो नृपतिः स्वबलैः सह वनं प्राप्तः; एतादृशे कालेऽत्र निवसन्तः पाण्डवाः यदि पृष्ठतः नानुयायुः सहाय्यं च न कुर्युः, तद् न तेषां शोभनम्।
Verse 73
भवतस्ते सहाया वै प्रेष्यतां पूर्वमागता: । पाण्डव शौर्यसम्पन्न, बलवान् तथा युद्धमें पीठ न दिखानेवाले हैं। वे आपके दास तो बहुत पहले ही हो चुके हैं, अतः उन्हें आपका सहायक होना ही चाहिये
भवतस्ते सहाया ये पूर्वमागताः, ते प्रथमं प्रेष्यन्ताम्। पाण्डवाः शौर्यसम्पन्ना बलवन्तश्च, युद्धे च कदापि न पृष्ठं दर्शयन्ति; चिरात् ते तव सेवाबद्धा इव, अतः तव सहायाः भवितुमर्हन्ति।
Verse 236
अज्ञातैर्यदि वा ज्ञातै: कर्तव्यं नूपते: प्रियम् | कुरुश्रेष्ठ॒ जो राजकीय सेनामें रहकर जीविका चलाते हैं तथा राजाके राज्यमें निवास करते हैं, वे ज्ञात हों या अज्ञात; उनका कर्तव्य है कि वे सदा राजाका प्रिय करें
अज्ञातैरपि वा ज्ञातैः कर्तव्यं नृपतेः प्रियम् । ये राजकीयसेनायां जीविकां कुर्वते जनाः ॥ ये च राज्ञो राज्ये वसन्ति, ते सर्वे—ज्ञाता अज्ञाताश्च—सदा नृपस्य प्रियमेवाचरितुमर्हन्ति; एष एव तेषां धर्मः, कुरुश्रेष्ठ ॥
Verse 250
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनप्रायोपवेशे कर्णवाक्ये पजञ्चाशदधिकद्धिशततमो<्ध्याय:
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनप्रायोपवेशे कर्णवाक्ये पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥
The dilemma centers on whether power and prosperity can justify violating marital and protective norms; Jayadratha frames comfort as prudence, while Draupadī treats the proposal as an ethical breach irrespective of changing fortune.
The chapter underscores that dharma is not contingent upon external success: fidelity, restraint, and respect for social obligations remain binding even when political status and wealth fluctuate.
No explicit phalaśruti appears in the cited verses; the chapter’s function is primarily narrative-ethical, establishing character positions and the normative critique that frames subsequent repercussions.