Adhyaya 241
Vana ParvaAdhyaya 24132 Verses

Adhyaya 241

Bhīṣma’s Admonition; Duryodhana’s Rājasūya Aspiration and the Proposal of a Vaiṣṇava-satra

Upa-parva: Gandharva-episode aftermath: Dhṛtarāṣṭra–Karṇa counsel and the proposed Vaiṣṇava-satra (Rājasūya-equivalent)

Janamejaya asks what the Kaurava leaders did while the Pandavas resided in the forest. Vaiśaṃpāyana reports that after the Gandharva incident and the Pandavas’ intervention, Bhīṣma addresses Duryodhana with a corrective assessment: he had earlier advised against the forest venture; Duryodhana was seized by enemies and released by the dharma-aligned Pandavas, yet shows no shame. Bhīṣma highlights that Karṇa retreated in fear during the Gandharva battle, underscoring the limits of their martial standing relative to the Pandavas. Bhīṣma recommends a settlement (saṃdhi) with the Pandavas for the growth of the Kuru line. Duryodhana departs with Śakuni; Karṇa and Duḥśāsana follow. Bhīṣma withdraws in embarrassment. Duryodhana then consults ministers on what is beneficial. Karṇa encourages him to rule as unrivaled and proposes initiating a major sacrifice. Duryodhana expresses desire for a Rājasūya like Yudhiṣṭhira’s; Karṇa supports preparations and summons priests. The purohita refuses: a Rājasūya is not feasible while Yudhiṣṭhira lives and while Dhṛtarāṣṭra remains alive, citing precedence and conflict with propriety. He proposes an alternative great rite, a Vaiṣṇava-satra comparable to Rājasūya, funded by tribute and requiring preparation of the yajña-ground (including ploughing). The court approves; the king assigns tasks; artisans are ordered to execute the required implements and arrangements.

Chapter Arc: दुर्योधन अपनी विशाल सेना सहित वन में ‘घोषयात्रा’ के लिए आता है—गौओं की देखभाल और शिकार-विहार के बहाने, पर भीतर-भीतर पाण्डवों को दिखाकर अपमानित करने का गर्व भी साथ चलता है। → रमणीय, जल-वनस्पति से भरपूर देश में कौरवों के अलग-अलग शिविर सजते हैं—दुर्योधन के निकट कर्ण, शकुनि, दुःशासन आदि; फिर वे चारों ओर वन्य पशुओं का शिकार करते हुए पुण्य-प्रसिद्ध द्वैतवन-सरोवर की ओर बढ़ते हैं और वहाँ क्रीड़ा-स्थल बनवाने की आज्ञा देते हैं। → द्वैतवन के क्षेत्र में गन्धर्वों से सामना होता है; गन्धर्व दूत कौरव सैनिकों को फटकारते हैं—‘तुम्हारा राजा मूर्ख है, देवलोकवासी गन्धर्वों को बनियों की तरह समझकर आदेश दे रहा है’—और चेतावनी देते हैं कि तुरंत लौटो, नहीं तो परिणाम भोगो। → गन्धर्वों की कठोर वाणी सुनकर कौरव सेना के अग्रणी योद्धा घबरा उठते हैं और जहाँ धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन है, उसी ओर भागकर सूचना देने दौड़ते हैं। → गन्धर्वों की चेतावनी के बाद दुर्योधन क्या झुकेगा या अहंकार में टकराव को बुलाएगा—यह संकट अगले प्रसंग में फूटने को तैयार है।

Shlokas

Verse 1

हि >> आय न (0) हि 7 2 चत्वारिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वो्में परस्पर कटु संवाद वैशम्पायन उवाच अथ दुर्योधनो राजा तत्र तत्र वने वसन्‌ | जगाम घोषानभितत्तत्र चक्रे निवेशनम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा दुर्योधन जहाँ-तहाँ वनमें पड़ाव डालता हुआ उन घोषों (गोशालाओं)-के पास पहुँच गया और वहाँ उसने अपनी छावनी डाली

वैशम्पायन उवाच— अथ दुर्योधनो राजा तत्र तत्र वने वसन् । जगाम घोषानभितस्तत्र चक्रे निवेशनम् ॥

Verse 2

रमणीये समाज्ञाते सोदके समहीरुहे । देशे सर्वगुणोपेते चक्कुरावसथान्‌ परा:,उसके साथ गये हुए लोगोंने भी उस सर्वगुणसम्पन्न, रमणीय, सुपरिचित, सजल तथा सघन वृक्षावलियोंसे युक्त प्रदेशमें अपने डेरे डाल दिये

रमणीये समज्ञाते सोदके समहीरुहे । देशे सर्वगुणोपेते चक्रुरावसथान् पराः ॥

Verse 3

तथैव तत्समीपस्थान्‌ पृथगावसथान्‌ बहुन्‌ कर्णस्य शकुने श्वैव ३ 2७ | चैव सर्वश:,इसी प्रकार दुर्योधनके डेकके पास ही कर्ण, शकुनि तथा दुःशासन आदि सब भाइयोंके लिये पृथक्‌-पृथक्‌ बहुत-से खेमे पड़ गये

तथैव तत्समीपस्थान् पृथगावसथान् बहून् । कर्णस्य शकुनेश्चैव दुःशासनस्य च सर्वशः ॥

Verse 4

ददर्श स तदा गाव: शतशो5थ सहस््रश: । अड्कैरल॑क्षैश्ष ता: सर्वा लक्षयामास पार्थिव:,(रहनेकी व्यवस्था ठीक हो जानेपर) राजा दुर्योधनने अपनी सैकड़ों एवं हजारों गौओंका निरीक्षण करना आरम्भ किया। उन सबपर संख्या और निशानी डलवा दी

ददर्श स तदा गावः शतशोऽथ सहस्रशः । अङ्कैर् अलक्षैश्च ताः सर्वा लक्षयामास पार्थिवः ॥

Verse 5

अड्कयामास वसत्सांश्व॒ जज्ञे चोपसूतांस्त्वपि । बालवसत्साश्न या गाव: कालयामास ता अपि,फिर बछड़ोंपर भी संख्या और निशानी डलवायी और उनमेंसे जो नाथनेयोग्य थे, उन सबकी गणना कराकर उनपर पहचान डाल दी। जिन गौओंके बछड़े बहुत छोटे थे, उनकी भी अलग गणना करवायी

अङ्कयामास वत्सांश्च जज्ञे चोपसूतांस्त्वपि । बालवत्साश्च या गावः कालयामास ता अपि ॥

Verse 6

अथ स स्मारणं कृत्वा लक्षयित्वा त्रिहायनान्‌ | वृतो गोपालकै: प्रीतो व्यहरत्‌ कुरुनन्दन:,इस प्रकार जाँच-पड़तालका काम पूरा करके कुरुनन्दन दुर्योधनने तीन सालके बछड़ोंकी पृथक्‌ गणना करवायी और स्मरणके लिये सब कुछ लिखकर वह बड़ी प्रसन्नताके साथ ग्वालोंसे घिरकर उस वनमें विहार करने लगा

अथ स स्मारणं कृत्वा लक्षयित्वा त्रिहायनान् । वृतो गोपालकैः प्रीतो व्यहरत् कुरुनन्दनः ॥

Verse 7

स च पौरजन: सर्व: सैनिकाश्न सहस्रश: | यथोपजोषं चिक्रीडुर्वने तस्मिन्‌ यथामरा:,वे समस्त पुरवासी और सहस्रोंकी संख्यामें आये हुए सैनिक उस वनमें अपनी-अपनी रुचिके अनुसार देवताओंके समान क्रीड़ा करने लगे

स च पौरजनः सर्वः सैनिकाश्च सहस्रशः । यथोपजोषं चिक्रीडुर्वने तस्मिन् यथामराः ॥

Verse 8

ततो गोपा: प्रगातार: कुशला नृत्यवादने । धार्रराष्ट्रमुपातिष्ठन्‌ कन्याश्वैव स्वलंकृता:,तदनन्तर नृत्य और वादनकी कलामें कुशल कुछ गवैये गोप तथा गहने-कपड़ोंसे सजी हुई उनकी कन्याएँ दुर्योधनके समीप आयीं

ततो गोपाः प्रगातारः कुशला नृत्यवादने । धार्तराष्ट्रमुपातिष्ठन् कन्याश्चैव स्वलङ्कृताः ॥

Verse 9

स स्त्रीगणावृतो राजा प्रदह्ृष्ट: प्रददौ वसु । तेभ्यो यथाहमन्नानि पानानि विविधानि च,अपनी स्त्रियोंके साथ राजा दुर्योधन उनको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उन्हें बहुत- सा धन दिया तथा यथायोग्य नाना प्रकारकी खाने-पीनेकी वस्तुएँ अर्पित की

स स्त्रीगणावृतो राजा दुर्योधनः तान् दृष्ट्वा प्रदहृष्टः प्रददौ वसु । तेभ्यः यथार्हम् अन्नपानानि विविधानि च समर्पयामास ॥

Verse 10

ततस्ते सहिता: सर्वे तरक्षून्‌ महिषान्‌ मृगान्‌ । गवयर्क्षवराहांश्व समन्तात्‌ पर्यकालयन्‌,तदनन्तर वे सब लोग तरक्षुओं (जरखों), जंगली भैंसों, गवयों, रीछों और शूकरों एवं अन्य जंगली हिंसक पशुओंका सब ओरसे शिकार करने लगे

ततः ते सहिताः सर्वे तरक्षून् महिषान् मृगान् । गवयान् ऋक्षवराहांश्च समन्तात् पर्यकालयन् ॥

Verse 11

स ताउछरैविनिर्भिद्य गजांश्व सुबहून्‌ वने । रमणीयेषु देशेषु ग्राहयामास वै मृगान्‌,उन्होंने वनके रमणीय प्रदेशोंमें बहुत-से हाथियोंको अपने बाणोंसे विदीर्ण करके अनेकानेक हिंस्र पशुओंको पकड़ लिया

स तान् ऊर्ध्वैर्विनिर्भिद्य शरैः बहून् गजान् अश्वांश्च वने । रमणीयेषु देशेषु ग्राहयामास वै मृगान् ॥

Verse 12

गोरसानुपयुञ्जान उपभोगांश्व भारत । पश्यन्‌ स रमणीयानि वनान्युपवनानि च,भरतनन्दन! दुर्योधन अपने साथियोंसहित दूध आदि गोरसोंका उपयोग करता और भाँति-भाँतिके भोग भोगता हुआ वहाँके रमणीय वनों और उपवनोंकी शोभा देखने लगा। उनमें मतवाले भ्रमर गुंजार करते थे और मयूरोंकी मधुर वाणी सब ओर गूँज रही थी। इस प्रकार क्रमशः आगे बढ़ता हुआ वह परम पवित्र द्वैववननामक सरोवरके समीप जा पहुँचा

गोरसानुपयुञ्जान उपभोगांश्च भारत । पश्यन् स रमणीयानि वनान्युपवनानि च ॥

Verse 13

मत्तभ्रमरजुष्टानि बर्हिणाभिरुतानि च । अगच्छदानुपूर्व्येण पुण्यं द्वैतववनं सर:,भरतनन्दन! दुर्योधन अपने साथियोंसहित दूध आदि गोरसोंका उपयोग करता और भाँति-भाँतिके भोग भोगता हुआ वहाँके रमणीय वनों और उपवनोंकी शोभा देखने लगा। उनमें मतवाले भ्रमर गुंजार करते थे और मयूरोंकी मधुर वाणी सब ओर गूँज रही थी। इस प्रकार क्रमशः आगे बढ़ता हुआ वह परम पवित्र द्वैववननामक सरोवरके समीप जा पहुँचा

मत्तभ्रमरजुष्टानि बर्हिणाभिरुतानि च । अगच्छदनुपूर्व्येण पुण्यं द्वैतववनं सरः ॥

Verse 14

मत्तभ्रमरसंजुष्ट नीलकण्ठरवाकुलम्‌ । सप्तच्छदसमाकीर्ण पुन्नागबकुलैर्युतम्‌,वहाँ मधुमत्त भ्रमर कमलपुष्पोंका रस ले रहे थे। मयूरोंकी मधुर वाणीसे वह सारा प्रदेश व्याप्त हो रहा था। सप्तच्छद (छितवन)-के वृक्षोंसे वह सरोवर आच्छादित-सा जान पड़ता था। उसके तटोंपर मौलसिरी और नागकेसरके वृक्ष शोभा पा रहे थे

मत्तभ्रमरसंजुष्टं नीलकण्ठरवाकुलम् । सप्तच्छदसमाकीर्णं पुन्नागबकुलैर्युतम् ॥

Verse 15

ऋद्धया परमया युक्तो महेन्द्र इव वज्रभृत्‌ । यदृच्छया च तत्रस्थो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर:,उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी दिद्दान्‌ ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे

ऋद्धया परमया युक्तो महेन्द्र इव वज्रभृत् । यदृच्छया च तत्रस्थो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

Verse 16

ईजे राजर्षियज्ञेन साद्यस्केन विशाम्पते । दिव्येन विधिना चैव वन्येन कुरुसत्तम,उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी दिद्दान्‌ ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे

ईजे राजर्षियज्ञेन साद्यस्केन विशाम्पते । दिव्येन विधिना चैव वन्येन कुरुसत्तम ॥

Verse 17

(विद्वद्धिः सहितो धीमान्‌ ब्राह्मुणैर्वनवासिभि: ।) कृत्वा निवेशमभित: सरसस्तस्य कौरव । द्रौपद्या सहितो धीमान्‌ धर्मपत्न्या नराधिप:,उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी दिद्दान्‌ ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे

(विद्वद्भिः सहितो धीमान् ब्राह्मणैर्वनवासिभिः ।) कृत्वा निवेशमभितः सरसस्तस्य कौरव । द्रौपद्या सहितो धीमान् धर्मपत्न्या नराधिपः ॥

Verse 18

ततो दुर्योधन: प्रेष्यानादिदेश सहस्रश: । आक्रीडावसथा: क्षिप्रं क्रियन्तामिति भारत

ततो दुर्योधनः प्रेष्यानादिदेश सहस्रशः । आक्रीडावसथाः क्षिप्रं क्रियन्तामिति भारत ॥

Verse 19

भारत! तदनन्तर दुर्योधनने अपने सहस्रों सेवकोंको आज्ञा दी--'तुमलोग बहुत-से क्रीडामण्डप तैयार करो” ।। ते तथेत्येव कौरव्यमुक्त्वा वचनकारिण: । चिकीर्षन्तस्तदा55क्रीडाञ्जम्मुर्दतवनं सर:,आज्ञाकारी सेवक दुर्योधनसे “तथास्तु'” कहकर क्रीडाभवन बनानेकी इच्छासे द्वैतवनके सरोवरके निकट गये

वैशम्पायन उवाच—तदनन्तरं दुर्योधनः स्वसहस्रेषु परिचारकेषु आज्ञां ददौ—“बहूनि क्रीडामण्डपानि सज्जयत” इति। ते ‘तथास्तु’ इति कौरवस्य वचनं प्रतिगृह्य, आज्ञाकारिणः क्रीडासज्जां कर्तुमिच्छन्तः, द्वैतवनस्य सरसः समीपं जग्मुः।

Verse 20

प्रविशन्तं वनद्वारि गन्धर्वा: समवारयन्‌ | सेनाग्रयं धार्तराष्ट्रस्य प्राप्तं द्वैतवनं सर:,दुर्योधनका सेनानायक द्वैतवन सरोवरके अत्यन्त निकटतक पहुँच गया था, उस वनके द्वारपर पैर रखते ही उसको गन्धर्वोने रोक दिया

वैशम्पायन उवाच—द्वैतवनं सरः प्राप्तं धार्तराष्ट्रस्य सेनाग्र्यं वनद्वारि प्रविशन्तं गन्धर्वाः समवारयन्।

Verse 21

तत्र गन्धर्वराजो वै पूर्वमेव विशाम्पते । कुबेरभवनाद्‌ राजन्नाजगाम गणावृतः,राजन! वहाँ गन्धर्वराज चित्रसेन पहलेसे ही अपने सेवकगणोंके साथ कुबेरभवनसे आये हुए थे

तत्र गन्धर्वराजो वै पूर्वमेव विशाम्पते। कुबेरभवनाद् राजन्नाजगाम गणावृतः॥

Verse 22

गणैरप्सरसां चैव त्रिदशानां तथा55त्मजै: । विहारशील: क्रीडार्थ तेन तत्‌ संवृतं सर:,वे उन दिनों अप्सराओं तथा देवकुमारोंके साथ विभिन्न स्थानोंमें भ्रमण करते थे। उन्होंने स्वयं ही क्रीड़ाविहारके लिये उस सरोवरको सब ओरसे घेर लिया था

गणैरप्सरसां चैव त्रिदशानां तथात्मजैः। विहारशीलः क्रीडार्थं तेन तत् संवृतं सरः॥

Verse 23

तेन तत्‌ संवृतं दृष्टवा ते राजपरिचारका: । प्रतिजग्मुस्ततो राजन्‌ यत्र दुर्योधनो नूप:,राजन्‌! उस सरोवरको गन्धर्वराजने घेर रखा है, यह देखकर वे राजसेवक जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ लौट गये। जनमेजय! अपने सेवकोंका कथन सुनकर राजा दुर्योधनने युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले सैनिकोंको यह आदेश देकर भेजा कि “गन्धर्वोको वहाँसे मार भगाओ'

तेन तत् संवृतं दृष्ट्वा ते राजपरिचारकाः। प्रतिजग्मुस्ततो राजन् यत्र दुर्योधनो नृपः॥

Verse 24

स तु तेषां वच: श्रुत्वा सैनिकान्‌ युद्धदुर्मदान्‌ प्रेषयामास कौरव्य उत्सारयत तानिति,राजन्‌! उस सरोवरको गन्धर्वराजने घेर रखा है, यह देखकर वे राजसेवक जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ लौट गये। जनमेजय! अपने सेवकोंका कथन सुनकर राजा दुर्योधनने युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले सैनिकोंको यह आदेश देकर भेजा कि “गन्धर्वोको वहाँसे मार भगाओ'

स तु तेषां वचः श्रुत्वा सैनिकान् युद्धदुर्मदान् प्रेषयामास कौरव्य उत्सारयत तानिति। राजन्, उस सरोवरं गन्धर्वराजेन परिवृतं दृष्ट्वा ते राजसेवका यत्र राजा दुर्योधनस्तत्र प्रत्यागच्छन्। जनमेजय, स्वसेवकवचनं श्रुत्वा दुर्योधनः युद्धोन्मत्तान् सैनिकान् प्रेषयामास—“गन्धर्वान् हत्वा तस्मात् स्थानाद् अपसारयत” इति।

Verse 25

तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा राज्ञ: सेनाग्रयायिन: । सरो द्वैतवनं गत्वा गन्धर्वानिदमब्रुवन्‌,राजाका यह आदेश सुनकर उसकी सेनाके नायक द्वैतवन सरोवरके समीप जाकर गन्धर्वोंसे इस प्रकार बोले--

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राज्ञः सेनाग्रयायिनः। सरो द्वैतवनं गत्वा गन्धर्वानिदमब्रुवन्॥

Verse 26

राजा दुर्योधनो नाम धृतराष्ट्रसुतो बली । विजिहीर्षुरिहायाति तदर्थमपसर्पत,“गन्धर्वो! महाराज धृतराष्ट्रके बलवान्‌ पुत्र राजा दुर्योधन यहाँ विहार करनेकी इच्छासे पधार रहे हैं। तुमलोग उनके लिये यह स्थान खाली करके दूर चले जाओ'

राजा दुर्योधनो नाम धृतराष्ट्रसुतो बली। विजिहीर्षुरिहायाति तदर्थमपसर्पत॥

Verse 27

एवमुक्तास्तु गन्धर्वा: प्रहसन्तो विशाम्पते | प्रत्यब्रुवंस्तान्‌ पुरुषानिदं हि परुषं वच:,राजन्‌! उनके ऐसा कहनेपर गन्धर्व जोर-जोरसे हँसने लगे; और उन राजसेवकोंको उत्तर देते हुए उनसे इस प्रकार कठोर वाणीमें बोले--

एवमुक्तास्तु गन्धर्वाः प्रहसन्तो विशाम्पते। प्रत्यब्रुवंस्तान् पुरुषानिदं हि परुषं वचः॥

Verse 28

न चेतयति वो राजा मन्दबुद्धि: सुयोधन: । योअस्मानाज्ञापयत्येवं वैश्यानिव दिवौकस:

न चेतयति वो राजा मन्दबुद्धिः सुयोधनः। योऽस्मानाज्ञापयत्येवं वैश्यानिव दिवौकसः॥

Verse 29

“तुम्हारा राजा दुर्योधन मूर्ख है। उसे तनिक भी चेत नहीं है; क्योंकि वह हम देवलोकवासी गन्धर्वको भी बनियोंके समान समझकर इस प्रकार आज्ञा दे रहा है ।। यूयं मुमूर्षवश्चापि मन्दप्रज्ञा न संशय: । ये तस्य वचनादेवमस्मान्‌ ब्रूत विचेतस:,“तुमलोगोंकी भी बुद्धि मारी गयी है। इसमें संदेह नहीं कि तुम सब-के-सब मरना चाहते हो। तभी तो उस दुर्योधनके कहनेसे तुम इस प्रकार हमसे विचारहीन होकर बातें कर रहे हो

वैशम्पायन उवाच— यूयं मुमूर्षवश्चापि मन्दप्रज्ञा न संशयः। ये तस्य वचनादेवं अस्मान् ब्रूत विचेतसः॥

Verse 30

गच्छध्वं त्वरिता: सर्वे यत्र राजा स कौरव: । न चेदद्यैव गच्छथध्वं धर्मराजनिवेशनम्‌,“या तो तुम सब लोग तुरन्त वहीं लौट जाओ, जहाँ तुम्हारा राजा दुर्योधन रहता है। या यदि ऐसा नहीं करना है, तो अभी धर्मराजके नगर (यमलोक) की राह लो”

गच्छध्वं त्वरिताः सर्वे यत्र राजा स कौरवः। न चेदद्यैव गच्छध्वं धर्मराजनिवेशनम्॥

Verse 31

एवमुक्तास्तु गन्धर्व राज्ञ: सेनाग्रयायिन: । सम्प्राद्रवन्‌ यतो राजा धृतराष्ट्रसुतो&$भवत्‌,गन्धर्वोके ऐसा कहनेपर राजाके सेनानायक योद्धा वहीं भाग गये, जहाँ धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन स्वयं विराजमान था

एवमुक्तास्तु गन्धर्वराज्ञः सेनाग्रयायिनः। सम्प्राद्रवन् यतो राजा धृतराष्ट्रसुतोऽभवत्॥

Verse 240

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि गन्धर्वदुर्योधनसेनासंवादे चत्वारिंशदधिकद्विशततमो<ध्याय:

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि गन्धर्वदुर्योधनसेनासंवादे चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥

Frequently Asked Questions

Whether to pursue reconciliation after receiving undeserved rescue (acknowledging obligation and shame) or to convert resentment into a prestige project that competes for status through ritual display.

Ethical authority requires self-assessment and restraint: public humiliation and dependence on rivals should motivate prudence and settlement, not denial and escalation through vanity.

No explicit phalaśruti appears; the meta-function is structural—linking political embarrassment to ritual strategy, showing how legitimacy is negotiated through both conduct and sanctioned ceremonial order.