
कौशिकस्य क्रोधविनिवृत्तिः — Kauśika’s Anger Checked by Householder Dharma
Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Kauśika–Gṛhapatnī Saṃvāda (Dharma-sūkṣmatā Episode)
Mārkaṇḍeya introduces Kauśika, a learned brāhmaṇa devoted to Vedic recitation and tapas. While reciting beneath a tree, he is defiled by a crane’s droppings; seized by anger, he uses ascetic potency to bring the bird down, then regrets the act as a product of rāga-dveṣa. Seeking alms, he enters a household where a woman asks him to wait while she attends to ritual cleanliness and then urgently serves her hungry, fatigued husband. The brāhmaṇa rebukes her for delaying a brāhmaṇa, asserting the superior status and fiery power of brāhmaṇas. The woman responds with measured deference: she does not disrespect brāhmaṇas, yet her chosen dharma is patiśuśrūṣā (service to her husband), and she demonstrates insight by revealing knowledge of Kauśika’s earlier act against the crane. She teaches that anger is an internal enemy; true brāhmaṇa-qualities include truthfulness, self-control, non-retaliation, purity, study, and even-mindedness. She concludes that dharma is subtle and recommends that Kauśika seek further instruction from a self-controlled vyādha living in Mithilā. Kauśika’s anger subsides; he accepts the correction as spiritually beneficial and departs in self-reproach.
Chapter Arc: पाण्डव, मार्कण्डेय से पुनः ‘भूय एव’ कहकर किसी महाभाग्य-युक्त आख्यान की याचना करते हैं; वैषम्पायन के वचन से कथा का द्वार खुलता है—नीतिमार्गरत दो राजाओं, सेदुक और वृषदर्भ, का प्रसंग। → मार्कण्डेय बताते हैं कि वृषदर्भ ने बाल्यकाल से एक गुप्त व्रत धारण किया था—ब्राह्मण-याचक को ‘कुप्यम्’ (सोना-चाँदी आदि) के अतिरिक्त कुछ न देने का संकल्प। उधर सेदुक के पास वेदाध्ययनसम्पन्न ब्राह्मण आता है और गुरु-दक्षिणा में असाधारण याचना करता है—अश्वसहस्र। राजा की मर्यादा, सामर्थ्य और दान-धर्म के बीच तनाव बढ़ता है; ब्राह्मण शाप देने को उद्यत होता है। → ब्राह्मण स्पष्ट करता है कि वह सेदुक द्वारा भेजा गया है और उसी के उपदेशानुसार वृषदर्भ से याचना कर रहा है; वृषदर्भ दुविधा में पड़ता है—व्रत की सीमा बनाम ब्राह्मण-वचन की अवहेलना का भय। राजा कहता है कि वह पूर्वाह्न में वही देगा जो राजकीय कर/बलि के रूप में प्राप्त होगा—दान को ‘यथालाभ’ से बाँधकर शाप-भय और व्रत-पालन के बीच एक तीक्ष्ण, जोखिमभरा समाधान चुनता है। → वृषदर्भ ब्राह्मण को तत्काल आश्वासन देता है और दान की व्यवस्था को राज्य-आय (बलि) से जोड़ देता है; ब्राह्मण के शाप-उद्यम को रोककर संवाद को दान-प्रतिज्ञा की दिशा में मोड़ देता है। अध्याय का अंत इस नैतिक गाँठ पर होता है कि दान का व्रत, दाता की क्षमता, और याचक की अपेक्षा—तीनों का संतुलन कैसे साधा जाए। → ब्राह्मण की याचना (अश्वसहस्र) और वृषदर्भ की ‘पूर्वाह्न-बलि’ वाली प्रतिज्ञा के बाद प्रश्न लटकता है—क्या राज्य-आय पर्याप्त होगी, और क्या वृषदर्भ अपने गुप्त व्रत तथा ब्राह्मण-धर्म दोनों की रक्षा कर पाएगा?
Verse 1
हि >> मो न (0) है 7 घण्णवत्यधिकशततमो< ध्याय: सेदुक और वृषदर्भका चरित्र वैशम्पायन उवाच भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डव:
वैशम्पायन उवाच—भूय एव पाण्डवो महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत्। “भगवन्, पुनरेव मे क्षत्रियाणां माहात्म्यं शृण्वय।”
Verse 2
अथाचष्ट... मार्कण्डेयो महाराज वृषदर्भसेदुकनामानौ राजानौ नीतिमार्गरतावस्त्रोपास्त्रकृतिनौ
अथ मार्कण्डेयोऽब्रवीत्—“महाराज, पुरा वृषदर्भसेदुकनामानौ राजानौ बभूवतुः। उभौ नीतिमार्गरतौ, अस्त्रोपास्त्रविद्यायां च कृतिनौ।”
Verse 3
सेदुको वृषदर्भस्य बालस्यैव उपांशुव्रतम भ्यजानात् कुप्यमदेयं ब्राह्मणस्य
सेदुको वृषदर्भस्य बाल्य एवोपांशुव्रतमभ्यजानात्—कुप्यमदेयं ब्राह्मणस्य; सुवर्णरजते एव दातव्ये इति।
Verse 4
अथ त॑ सेदिकं ब्राह्मण: कश्निद् वेदाध्ययनसम्पन्न आशिषं दत्त्वा गुर्वर्थी भिक्षितवान्
वैशम्पायन उवाच—अथ कश्चिद् ब्राह्मणो वेदाध्ययनसम्पन्नः सेदुकं राजानमुपेत्याशिषं दत्त्वा गुर्वर्थी भिक्षितवान्—“राजन्, मे सहस्रं अश्वान् देहि।” स तं प्रत्युवाच—“ब्रह्मन्, न शक्नोम्यहं तवाभीष्टां गुरुदक्षिणां दातुम्।”
Verse 5
अश्वसहस््र॑ मे भवान् ददात्विति तं सेदुको ब्राह्मणमब्रवीत्
वैशम्पायन उवाच— कदाचिद् वेदाध्ययनसम्पन्नो ब्राह्मणः सेदुकं राजानमुपेत्य तं आशीर्भिरभिनन्द्य, गुरुदक्षिणार्थं भिक्षामयाचत— “राजन्, मे अश्वसहस्रं देहि” इति। तस्य वचनं श्रुत्वा सेदुको राजा तं ब्राह्मणमब्रवीत— “ब्राह्मण, तवाभीष्टां गुरुदक्षिणां दातुं मम न शक्यम्” इति।
Verse 6
नास्ति सम्भवो गुर्वर्थ दातुमिति
वैशम्पायन उवाच— “गुर्वर्थं तादृशं दातुं मम न सम्भवः” इति। कदाचिद् वेदाध्ययनसम्पन्नो ब्राह्मणः सेदुकं राजानमुपेत्य तं आशीर्भिरभिनन्द्य, गुरुदक्षिणार्थं भिक्षामयाचत— “राजन्, मे अश्वसहस्रं देहि” इति। तं प्रति सेदुको राजा अब्रवीत— “ब्राह्मण, तवाभीष्टां गुरुदक्षिणां दातुं मम न शक्यम्” इति।
Verse 7
स त्वं गच्छ वृषदर्भसकाशम् । राजा परम-पधर्मज्ञो ब्राह्मण तं भिक्षस्व । स ते दास्यति तस्यैतदुपांशुब्रतमिति
वैशम्पायन उवाच— “अतः त्वं वृषदर्भसकाशं गच्छ। ब्राह्मण, स राजा परमधर्मज्ञः; तमेव भिक्षस्व। स तेऽभीष्टं दास्यति— एतदस्योपांशुव्रतम्” इति।
Verse 8
अथ ब्राह्मणो वृषदर्भसकाशं गत्वा अश्वसहसत्रमयाचत् । स राजा त॑ कशेनाताडयत्,“तब ब्राह्मण देवताने वृषदर्भके पास जाकर एक हजार घोड़े माँगे। यह सुनकर राजा उन्हें कोड़ेसे पीटने लगे”
वैशम्पायन उवाच— अथ स ब्राह्मणो वृषदर्भसकाशं गत्वा अश्वसहस्रमयाचत। तदाकर्ण्य स राजा तं कशेनाताडयत्।
Verse 9
त॑ ब्राह्मणो<ब्रवीत् । कि हिंस्पनागसं मामिति,“यह देख ब्राह्मणने उनसे पूछा--“राजन्! मुझ निरपराधको आप क्यों मार रहे हैं!
वैशम्पायन उवाच— ततः स ब्राह्मणोऽब्रवीत— “किमर्थं निरपराधं मां हिंससि” इति।
Verse 10
एवमुक्क्त्वा तं॑ शपन्तं राजा55ह । विप्र कि यो न ददाति तुभ्यमुताहोस्विद् ब्राह्मण्यमेतत्
एवमुक्त्वा तं शपन्तं ब्राह्मणं दृष्ट्वा राजा तमब्रवीत्— “विप्रवर! यो हि तुभ्यं स्वधनं न ददाति, तं शपितुमुचितं किम्? उतैतदेव ब्राह्मणोचितं कर्म?”
Verse 11
ब्राह्मणने कहा--'राजाधिराज! आपके पास राजा सेदुकने मुझे भेजा है, तभी आपसे गुरु-दक्षिणा माँगने आया हूँ। उनके उपदेशके अनुसार ही मैंने आपसे याचना की है!
ब्राह्मण उवाच— “राजाधिराज! सेदुकेन नृपतेनाहं तव समीपं प्रेषितः; तस्मात् गुरुदक्षिणां याचितुमागतः। तस्यैव अनुशासनानुसारं त्वां याचितवानस्मि।”
Verse 12
राजोवाच पूर्वाह्न ते दास्यामि यो मे5द्य बलिरागमिष्यति | यो हन्यते कशया कथं मोघं क्षेपणं तस्य स्थात्
राजोवाच— “ब्राह्मण! अद्य यन्मम राजकररूपेण बलिरागमिष्यति, तत् श्वः पूर्वाह्णे तुभ्यं दास्यामि। यः कशया ताड्यते, स कथं रिक्तहस्तः प्रेष्येत? कथं वा मम प्रतिज्ञा मोघा भवेत्?”
Verse 13
ब्राह्मण उवाच राजाधिराज तव समीपं सेदुकेन प्रेषितो भिक्षितु-मागत: । तेनानुशिष्टेन मया त्वं भिक्षितोडसि
ब्राह्मण उवाच— “राजाधिराज! सेदुकेन प्रेषितोऽहं तव समीपं भिक्षितुमागतः; तेनानुशिष्टेन मया त्वत्तो भिक्षा याचिता।” इत्युक्त्वा राजा तस्मै ब्राह्मणाय दैवसिकामुत्पत्तिं प्रादात्; अश्वसहस्रस्यापि मूल्यादधिकं धनं दत्तवान्।
Verse 195
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें ययातिचरितविषयक एक सौ पज्चानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ययातिचरितविषयो नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः समाप्तः।
Verse 196
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि सेदुकवृषदर्भचरिते षण्णवत्यधिकशततमो<ध्याय:
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि सेदुकवृषदर्भचरिते षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः।
Whether ascetic power and social rank justify punitive anger: Kauśika’s reaction to a minor offense reveals the conflict between status-driven indignation and the ethical requirement of restraint and proportionality.
Dharma is subtle and anchored in self-mastery: anger is an internal enemy; genuine brāhmaṇa excellence is defined by truth, non-retaliation, discipline, study, and even-minded conduct rather than mere ritual learning or tapas.
Yes: the chapter explicitly treats anger and delusion as obstacles to spiritual welfare and portrays correction (accepting rebuke and seeking instruction) as a step toward niḥśreyasa—highest good—by aligning power with ethical restraint.
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