Mahabharata Adhyaya 175
Vana ParvaAdhyaya 17519 Verses

Adhyaya 175

Bhīmasena’s Himalayan Hunt and Seizure by the Ajagara (भीमसेनस्य अजगरग्रहणम्)

Upa-parva: Ajagara-upākhyāna (Episode of the Ajagara/Great Serpent)

Janamejaya questions how Bhīmasena—described as possessing the life-force of myriad nāgas and famed for challenging formidable beings—could experience acute fear from an ajagara. Vaiśaṃpāyana situates the event during the Pandavas’ forest residence near a royal seer’s āśrama and then follows Bhīma moving through a visually abundant Himalayan landscape: auspicious regions frequented by devas, gandharvas, siddhas, and apsarases; birdsong (cakora, cakravāka, kokila, etc.); trees bearing perennial flowers and fruits; gem-like cold waters with waterfowl; and forests of deodāra and sandal. While engaged in hunting across plains and arid stretches, Bhīma encounters an enormous, terrifying serpent occupying a mountain fastness and covering a cavern with its body. The ajagara is detailed with cave-like mouth, four fangs, blazing copper-red eyes, and a death-like presence amplified by hissing and heavy breath. It suddenly grips Bhīma by both arms; upon mere contact Bhīma’s consciousness becomes clouded due to the serpent’s boon-derived power. Despite Bhīma’s famed strength, he cannot maneuver or counteract the constriction; he struggles intensely to free himself but is unable to impede the serpent’s hold, establishing a crisis that requires resolution beyond straightforward force.

Chapter Arc: युधिष्ठिर के पूछने पर अर्जुन इन्द्रलोक-प्रवास का वृत्तान्त आगे बढ़ाता है—कैसे वह इन्द्र का विश्वासपात्र बना और दिव्य लोक की मर्यादा में धीरे-धीरे स्थिर हुआ। → अर्जुन के घाव भरते हैं; इन्द्र उसे स्नेहपूर्वक हाथ पकड़कर निकट लाते हैं, दिव्य वस्त्र-आभूषण प्रदान करते हैं और गन्धर्वकुमारों के साथ रहने का सौभाग्य देते हैं। इसी सम्मान के बीच अर्जुन के भीतर एक तीव्र आकांक्षा जागती है—उन दिव्यास्त्रों को देखने/पाने की, जिनसे निवातकवच जैसे अजेय शत्रु भी मारे जा सकें। → अर्जुन का स्पष्ट निवेदन—‘भारत! मैं उन दिव्यास्त्रों को देखना चाहता हूँ जिनसे निवीतकवच (निवातकवच) मारे गये’—यह क्षण उसके तप-पराक्रम को लक्ष्य में बदल देता है: अब उसका इन्द्रलोक-प्रवास केवल आतिथ्य नहीं, अस्त्र-प्राप्ति की निर्णायक यात्रा है। → इन्द्र के भवन में अर्जुन का सम्मानित, सुखपूर्वक निवास स्थापित होता है; कथा-धारा ‘अस्त्रदर्शन/अस्त्र-प्राप्ति’ की दिशा में व्यवस्थित हो जाती है। वैशम्पायन संकेत करते हैं कि अर्जुन ने यह वृत्तान्त कहकर उस रात्रि भाइयों के साथ विश्राम किया। → इन्द्र अर्जुन की इच्छा पर क्या उत्तर देंगे—क्या, कब और किन शर्तों पर दिव्यास्त्रों का दर्शन/उपदेश होगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका २३ श्लोक मिलाकर कुल ७७३ श्लोक हैं) छः #&< (9) #प्टज 2४ चतुःसप्तरत्यांधेकशततमो< ध्याय: 80: कक कं यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना अजुन उवाच ततो मामतिविश्वस्तं संरूढशरविक्षतम्‌ देवराजो विगृहोदं काले वचनमब्रवीत्‌

अर्जुन उवाच—ततो मामतिविश्वस्तं संरूढशरविक्षतम्। देवराजो विगृह्येदं काले वचनमब्रवीत्॥

Verse 2

अर्जुन कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर मैं देवराजका अत्यन्त विश्वासपात्र बन गया। धीरे- धीरे मेरे शरीरके सब घाव भर गये। तब एक दिन देवराज इन्द्रने मेरा हाथ पकड़कर कहा -- १ ॥। दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि त्वयि तिष्ठन्ति भारत न त्वाभिभवितुं शक्तो मानुषो भुवि कश्चन

राजन्ननन्तरं देवराजस्याहं परमविश्वासपात्रमभवम्। शनैः शनैर्मम सर्वे व्रणाः समरुह्यन्त। अथ कदाचिद् देवराज इन्द्रो मम हस्तं गृहीत्वा प्रोवाच—दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि त्वयि तिष्ठन्ति भारत; न त्वाभिभवितुं शक्तो मानुषो भुवि कश्चन॥

Verse 3

भीष्मो द्रोण: कृप: कर्ण: शकुनि: सह राजभि: संग्रामस्थस्य ते पुत्र कलां नाहन्ति षघोडशीम्‌

भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णः शकुनिः सह राजभिः। संग्रामस्थस्य ते पुत्र कलां नाहन्ति षोडशीम्॥

Verse 4

इदं च मे तनुत्राणं प्रायच्छन्मघवान प्रभु: अभेद्यं कवचं दिव्यं स्रजं चैव हिरण्मयीम्‌,महाराज! उन देवेश्वर इन्द्रने स्वयं मेरे शरीरकी रक्षा करनेवाला यह अभेद्य दिव्य कवच और यह सुवर्णमयी माला मुझे दी

इदं च मे तनुत्राणं प्रायच्छन्मघवान् प्रभुः—अभेद्यं कवचं दिव्यं स्रजं चैव हिरण्मयीम्।

Verse 5

देवदत्तं च मे शड्खं पुनः प्रादान्महारवम्‌ दिव्यं चेदं किरीटं मे स्वयमिन्द्रो युयोज ह

देवदत्तं च मे शङ्खं पुनः प्रादान्महारवम्। दिव्यं चेदं किरीटं मे स्वयमिन्द्रो युयोज ह॥

Verse 6

ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च प्रादाच्छक्रो ममैतानि रुचिराणि बृहन्ति च,तत्पश्चात्‌ देवराजने मुझे ये मनोहर एवं विशाल दिव्य वस्त्र तथा दिव्य आभूषण दिये

ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च। प्रादाच्छक्रो ममैतानि रुचिराणि बृहन्ति च॥

Verse 7

एवं सम्पूजितस्तत्र सुखमस्म्युषितो नृप इन्द्रस्य भवने पुण्ये गन्धर्वशिशुभि: सह

एवं सम्पूजितस्तत्र सुखमस्म्युषितो नृप। इन्द्रस्य भवने पुण्ये गन्धर्वशिशुभिः सह॥

Verse 8

महाराज! इस प्रकार सम्मानित होकर मैं उस पवित्र इन्द्रभवनमें गन्धर्वकुमारोंके साथ सुखपूर्वक रहने लगा ।।

महाराज! इस प्रकार सम्मानित होकर मैं उस पवित्र इन्द्रभवनमें गन्धर्वकुमारोंके साथ सुखपूर्वक रहने लगा ।। ततो मामब्रवीच्छक्र: प्रीतिमानमरै: सह समयो.र्डजुन गन्तुं ते भ्रातरो हि स्मरन्ति ते,

Verse 9

एवमिन्द्रस्यथ भवने पञ्च वर्षाणि भारत उषितानि मया राजन्‌ स्मरता द्यूतजं कलिम्‌,भारत! इस प्रकार द्यूतजनित कलहका स्मरण करते हुए मैंने इन्द्रभवनमें पाँच वर्ष व्यतीत किये हैं

एवमिन्द्रस्याथ भवने पञ्च वर्षाणि भारत उषितानि मया राजन् स्मरता द्यूतजं कलिम्।

Verse 10

ततो भवन्‍न्तमद्राक्ष॑ं भ्रातृभि: परिवारितम्‌ गन्धमादनपादस्य पर्वतस्यास्य मूर्थनि,इसके बाद इस गन्धमादनकी शाखाभूत इस पर्वतके शिखरपर भाइयोंसहित आपका दर्शन किया है

ततो भवन्तमद्राक्षं भ्रातृभिः परिवारितं गन्धमादनपादस्य पर्वतस्यास्य मूर्धनि।

Verse 11

युधिछ्िर उवाच दिष्ट्या धनंजयास्त्राणि त्वया प्राप्तानि भारत दिष्ट्या चाराधितो राजा देवानामीश्वर: प्रभु:

युधिष्ठिर उवाच—दिष्ट्या धनंजयास्त्राणि त्वया प्राप्तानि भारत। दिष्ट्या चाराधितो राजा देवानामीश्वरः प्रभुः॥

Verse 12

दिष्ट्या च भगवान्‌ स्थाणुर्देव्या सह परंतप साक्षाद्‌ दृष्ट: स्वयुद्धेन तोषितश्न॒ त्वयानघ

युधिष्ठिर उवाच—दिष्ट्या च भगवान् स्थाणुर्देव्या सह परंतप। साक्षाद् दृष्टः स्वयुद्धेन तोषितश्च त्वयानघ॥

Verse 13

दिष्ट्या च लोकपालैस्त्वं समेतो भरतर्षभ दिष्ट्या वर्धामहे पार्थ दिष्ट्यासि पुनरागत:

युधिष्ठिर उवाच—दिष्ट्या च लोकपालैस्त्वं समेतो भरतर्षभ। दिष्ट्या वर्धामहे पार्थ दिष्ट्यासि पुनरागतः॥

Verse 14

अद्य कृत्स्नां महीं देवीं विजितां पुरमालिनीम्‌ मन्ये च धृतराष्ट्रस्य पुत्रानपि वशीकृतान्‌

युधिष्ठिर उवाच—अद्याहं मन्ये कृत्स्नां महीं देवीं पुरमालिनीं विजिताम्। धृतराष्ट्रस्य पुत्रानपि वशीकृतानिव मन्ये॥

Verse 15

इच्छामि तानि चास्त्राणि द्रष्टें दिव्यानि भारत यैस्तथा वीर्यवन्तस्ते निवीतकवचा हत:

युधिष्ठिर उवाच—इच्छामि तानि दिव्यान्यस्त्राणि द्रष्टुं, भारत, यैस्त्वया तथा वीर्यवन्तो निवीतकवचा हताः॥

Verse 16

अजुन उवाच श्वः प्रभाते भवान्‌ द्रष्टा दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः निवातकववचा घोरा यैर्मया विनिपातिता:

अर्जुन उवाच—श्वः प्रभाते भवान् सर्वशो दिव्यान्यस्त्राणि द्रक्ष्यति, यैर्मया घोरा निवातकवचा विनिपातिताः॥

Verse 17

वैशम्पायन उवाच एवमागमनं तत्र कथयित्वा धनंजय: भ्रातृभि: सहित: सर्वे रजनीं तामुवास ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार अपने आगमनका वृत्तान्त सुनाकर सब भाइयोंसहित अर्जुनने वहाँ वह रात व्यतीत की

वैशम्पायन उवाच—एवमागमनवृत्तान्तं तत्र कथयित्वा धनञ्जयः। भ्रातृभिः सहितः सर्वै रजनीं तामुवास ह॥

Verse 173

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें हिरण्यपुरवासी दैत्योंके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिहतत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि हिरण्यपुरवासिदैत्यवधविषयोऽध्यायः त्रिसप्तत्यधिकशततमः समाप्तः॥

Verse 174

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शनसंकेते चतु:सप्तत्यधिकशततमो<ध्याय:

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शनसंकेते चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः।

Frequently Asked Questions

The chapter stages a dilemma of capability versus circumstance: a renowned strong figure is rendered ineffective by boon-enabled constraint, raising the question of what constitutes effective action when strength alone fails.

The setup implies that resilience in adversity requires adaptive intelligence and reliance on broader resources (companions, counsel, or dharmic means), not only immediate force.

No explicit phalaśruti appears within the provided verses; the meta-commentary functions indirectly through Janamejaya’s inquiry and Vaiśaṃpāyana’s framing of wonder, fear, and boon-mediated causality.

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