अध्याय ८२ — केशवप्रयाणे निमित्तदर्शनम्
Omens and Reception During Keśava’s Departure
सुयोधनभयाद् या नोअत्रायतामित्रकर्शन । महतो मृत्युसम्बाधादुद्दप्रे नौरिवार्णवात्,युधिष्ठिर बोले--शत्रुओंका संहार करनेवाले जनार्दन! अबला होकर भी जिसने बाल्यकालसे ही हमें पाल-पोसकर बड़ा किया है, उपवास और तपस्यामें संलग्न रहना जिसका स्वभाव बन गया है, जो सदा कल्याणसाधनमें ही लगी रहती है, देवताओं और अतिथियोंकी पूजामें तथा गुरुजनोंकी सेवा-शुश्रूषामें जिसका अटूट अनुराग है, जो पुत्रवत्सला एवं पुत्रोंको प्यार करनेवाली है, जिसके प्रति हम पाँचों भाइयोंका अत्यन्त प्रेम है, जिसने दुर्योधनके भयसे हमारी रक्षा की है, जैसे नौका मनुष्यको समुद्रमें डूबनेसे बचाती है, उसी प्रकार जिसने मृत्युके महान् संकटसे हमारा उद्धार किया है और माधव! जिसने हमलोगोंके कारण सदा दुःख ही भोगे हैं, उस दुःख न भोगनेके योग्य हमारी माता कुन्तीसे मिलकर आप उसका कुशल-समाचार अवश्य पूछें
suyodhanabhayād yā no 'trāyatāmitrakarśana | mahato mṛtyusambādhād uddapre naur ivārṇavāt ||
युधिष्ठिर उवाच— शत्रुकर्षण जनार्दन! सुयोधनभयात् या नः अत्र रक्षां चकार; यथा नौः अर्णवे निमग्नं जनं तारयति, तथा सा महतो मृत्युसम्बाधात् नः समुद्धृतवती। अतः त्वं यदा अस्माकं मातरं कुन्तीम् उपसर्पसि— या अस्मत्कृते दीर्घकालं दुःखानि सोढवती, अदुःखार्हा सती— तदा तस्याः कुशलं पृच्छेः।
युधिष्ठिर उवाच
The verse foregrounds kṛtajñatā (gratitude) and putra-dharma (a child’s duty): one must remember and honor the sacrifices of parents/guardians, inquire after their well-being, and acknowledge protection received in times of mortal danger.
In the Udyoga Parva’s pre-war diplomacy, Yudhiṣṭhira addresses Kṛṣṇa, recalling how their mother Kuntī safeguarded the Pāṇḍavas amid Duryodhana’s threats and rescued them from near-death situations; he asks Kṛṣṇa to meet her and convey concern for her welfare.