अध्याय ७५ — दैव-पुरुषकार-समन्वयः
Reconciling Contingency and Human Effort
वेत्सि दाशार्ह सत्यं मे दीर्घकालं सहोषित: । भीमसेनने कहा--अच्युत! मैं करना तो कुछ और चाहता हूँ, परंतु आप समझ कुछ और ही रहे हैं। दशाहनन्दन! आप दीर्घकालतक मेरे साथ रहे हैं। अतः मेरे विषयमें यह सच्ची जानकारी रखते ही होंगे कि मेरा युद्धमें अत्यन्त अनुराग है और मेरा पराक्रम भी मिथ्या नहीं है
vetsi dāśārha satyaṃ me dīrghakālaṃ sahoṣitaḥ |
वेत्सि दाशार्ह सत्यं मे दीर्घकालं सहोषितः ।
भीमसेन उवाच