भीमसेनस्य आत्मबलप्रशंसा — Bhīmasena’s Assertion of Strength
Udyoga Parva, Adhyāya 74
अनित्यं किल मर्त्यस्य पार्थ चित्त चलाचलम् | वातवेगप्रचलिता अछ्लीला शाल्मलेरिव,पार्थ! कहते हैं कि मनुष्यका चित्त सदा एक निश्चयपर अटल नहीं रहता। वह हवाके वेगसे हिलती हुई सेंमलके फलकी गाँठके समान डाँवाडोल रहता है
anityaṃ kila martyasya pārtha cittaṃ calācalaṃ | vātavega-pracalitaṃ aślīlā śālmaler iva ||
वैशम्पायन उवाच—अनित्यं किल मर्त्यस्य पार्थ चित्तं चलाचलम्। वातवेगप्रचलिता अछ्लीला शाल्मलेरिव॥
वैशम्पायन उवाच