Adhyaya 60: Self-Assertion, Daiva, and the Rhetoric of Inevitability (उद्योग पर्व)
लोकसाक्षिकमेतन्मे माहात्म्यं दिक्षु विश्रुतम् । आश्चासनार्थ भवतः प्रोक्ते न श्लाघया नूप,“राजन! मेरा यह माहात्म्य सब लोगोंकी आँखोंके समक्ष है; सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रसिद्ध है। मैंने आपके आश्वासनके लिये ही इसकी यहाँ चर्चा की है, आत्मप्रशंसा करनेके लिये नहीं
लोकसाक्षिकमेतन्मे माहात्म्यं दिक्षु विश्रुतम् । आश्वासनार्थं भवतः प्रोक्तं न श्लाघया नृप ॥
वैशम्पायन उवाच