Sainyasaṅgraha and Bhāga-Vyavasthā (Forces Assembled and Rival Allocations) | सैन्यसंग्रह-भागव्यवस्था
“धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके द्वारा एकत्र किये हुए जो-जो नरेश अस्त्र-शस्त्रोंकी मारकाटसे व्याप्त हुए भयानक संग्राममें मेरे सामने आयेंगे, वे कितने ही क्रोधमें भरे हुए क्यों न हों, सगे-सम्बन्धियोंसहित रणभूमिमें आये हुए उन सभी राजाओंको मैं अकेला ही उसी प्रकार वशमें कर लूँगा, जैसे तिमि नामक महामत्स्य जलकी दूसरी मछलियोंको निगल जाता है ।। भीष्म द्रोणं कृपं कर्ण द्रौ्णिं शल्यं सुयोधनम् । एतांश्वापि निरोत्स्यामि वेलेव मकरालयम्,'भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, शल्य तथा दुर्योधन--इन सबको मैं उसी भाँति आगे बढ़नेसे रोक दूँगा, जैसे किनारा समुद्रको रोके रखता है”
dhṛtarāṣṭraputra duryodhanakena ekatrīkṛtā ye ye nareśā astrāśastramārakāṭena vyāptā bhayānake saṅgrāme mama samakṣam āyāsyanti, te katicid api krodhena pūrṇāḥ syuḥ, svasvajanasahitaṃ raṇabhūmim āgatān sarvān tān rājñaḥ aham eka eva tathā vaśe kariṣyāmi yathā timināmā mahāmatsyaḥ jalasya anyāḥ matsyān nigilati. bhīṣmaṃ droṇaṃ kṛpaṃ karṇaṃ drauṇiṃ śalyaṃ suyodhanam, etān śv api nirotsye velā iva makarālayam.
धार्तराष्ट्रेण सुयोधनेन संगृहीतान् ये ये पार्थिवाः शस्त्रप्रहारव्याप्ते घोरे संग्रामे ममाभिमुखं समागमिष्यन्ति, ते क्रोधसमाविष्टा अपि सानुबन्धाः समागताः सन्तो मया एकेनैव वशीकर्तव्याः—यथा तिमिर्महामत्स्यः सलिलेऽन्यान् मत्स्यान् ग्रसते। भीष्मं द्रोणं कृपं कर्णं द्रौणिं शल्यं सुयोधनं च—एतानपि निरोत्स्ये, यथा वेला मकरालयं वारयति।
संजय उवाच