उद्योगपर्व — अध्याय ५४: दुर्योधनस्य धृतराष्ट्रं प्रति बलप्रशंसन-युक्तः आश्वासनवादः
Duryodhana’s Reassurance and Force-Praise to Dhritarashtra
शलो भूरिश्रवाश्वैव विकर्णश्र॒ तवात्मज: । प्रजानाथ! हमलोगोंके पक्षमें जो विशिष्ट योद्धा हैं, उनकी संख्या अधिक है; यथा-- भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि, अश्वत्थामा, वैकर्तन कर्ण, सोमदत्त, बाह्लिक, प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त, शल्य, अवन्तीके दोनों राजकुमार विन्द और अनुविन्द, जयद्रथ, दुःशासन, दुर्मुख, दुःसह, श्रुतायु, चित्रसेन, पुरुमित्र, विविंशति, शल, भूरिश्रवा तथा आपका पुत्र विकर्ण। (इस प्रकार अपने पक्षके प्रमुख वीरोंकी संख्या शत्रुओंके प्रमुख वीरोंसे तीन गुनी अधिक है) || ६२--६४ ह ।। अक्षौहिण्यो हि मे राजन् दशैका च समाहता: । न्यूना: परेषां सप्तैव कस्मान्मे स्थात् पराजय:,महाराज! अपने यहाँ ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ संगृहीत हो गयी हैं, परंतु शत्रुओंके पक्षमें हमसे बहुत कम कुल सात अक्षौहिणी सेनाएँ हैं; फिर मेरी पराजय कैसे हो सकती है?
akṣauhiṇyo hi me rājan daśaikā ca samāhatāḥ | nyūnāḥ pareṣāṃ saptaiva kasmān me sthāt parājayaḥ ||
शलो भूरिश्रवाश्चैव विकर्णश्च तवात्मजः। अक्षौहिण्यो हि मे राजन् दशैका च समाहृताः। न्यूनाḥ परेषां सप्तैव कस्मान्मे स्थात् पराजयः॥
दुर्योधन उवाच