उद्योगपर्व — अध्याय ५४: दुर्योधनस्य धृतराष्ट्रं प्रति बलप्रशंसन-युक्तः आश्वासनवादः
Duryodhana’s Reassurance and Force-Praise to Dhritarashtra
विरक्तराष्ट्रश्न वयं मित्राणि कुपितानि नः । धिककृताः: पार्थिवै: सर्वे: स्वजनेन च सर्वश:,“उनके साथ युद्ध होनेपर हमारी पराजय निश्चित है; क्योंकि इस समय समस्त भूपाल राजा युधिष्ठिरके अधीन हैं। इस राज्यमें रहनेवाले सब लोग हमसे घृणा करते हैं। हमारे मित्र भी कुपित हो गये हैं। सम्पूर्ण नरेश और आत्मीयजन सभी हमें धिक्कार रहे हैं
viraktarāṣṭraś ca vayaṁ mitrāṇi kupitāni naḥ | dhikkṛtāḥ pārthivaiḥ sarvaiḥ svajanena ca sarvaśaḥ ||
विरक्तराष्ट्रा वयं मित्राणि कुपितानि नः। धिक्कृताः पार्थिवैः सर्वैः स्वजनेन च सर्वशः॥
दुर्योधन उवाच