Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Pramāda as Mṛtyu
Chapter 42
श्रेयांस्तु षड्विधस्त्याग: श्रियं प्राप्प न हृष्यति । इष्टापूर्ते द्वितीयं स्यान्नित्यवैराग्ययोगत:,राजेन्द्र! छ: प्रकारका जो सर्वश्रेष्ठ त्याग है, उसे बताते हैं। लक्ष्मीको पाकर हर्षित न होना--यह प्रथम त्याग है; यज्ञ-होमादिमें तथा कुएँ, तालाब और बगीचे आदि बनानेमें धन खर्च करना दूसरा त्याग है और सदा वैराग्यसे युक्त रहकर कामका त्याग करना-यह तीसरा त्याग कहा गया है। महर्षिलोग इसे अनिर्वचनीय मोक्षका उपाय कहते हैं। अतः यह तीसरा त्याग विशेष गुण माना गया है
śreyāṁs tu ṣaḍvidhas tyāgaḥ śriyaṁ prāpya na hṛṣyati | iṣṭāpūrte dvitīyaṁ syān nityavairāgyayogataḥ rājendra ||
सनत्सुजात उवाच— श्रेयांस्तु षड्विधस्त्यागः; श्रियं प्राप्य न हृष्यति— एष प्रथमः। इष्टापूर्ते धनं दत्त्वा यज्ञहोमादिषु तथा कूपतडागारामादिकर्मसु— एष द्वितीयः। नित्यवैराग्ययोगतः कामत्यागः परो मतः— एष तृतीयः; मुनयः तमवाच्यं मोक्षोपायं वदन्ति॥
सनत्युजात उवाच