हंस–साध्यसंवादः, वाक्-निग्रहः, महाकुल-लक्षणम्, शान्ति-उपायः
Hamsa–Sādhya Dialogue; Restraint of Speech; Marks of Noble Lineage; Means to Peace
यश्चाभिजात: प्रकरोत्यकार्य यश्चाबलो बलिना नित्यवैरी । अश्रद्धधानाय च यो ब्रवीति यश्चाकाम्यं कामयते नरेन्द्र,पाश हाथमें लिये यमराजके दूत इन सत्रह पुरुषोंको नरकमें ले जाते हैं, जो शासनके अयोग्य पुरुषपर शासन करता है, मर्यादाका उल्लंघन करके संतुष्ट होता है, शत्रुकी सेवा करता है, रक्षणके अयोग्य स्त्रीकी रक्षा करनेका प्रयत्न करता तथा उसके द्वारा अपने कल्याणका अनुभव करता है, याचना करनेके अयोग्य पुरुषसे याचना करता है तथा आत्मप्रशंसा करता है, अच्छे कुलमें उत्पन्न होकर भी नीच कर्म करता है, दुर्बल होकर भी सदा बलवानसे वैर रखता है, श्रद्धाहीनको उपदेश करता है, न चाहनेयोग्य (शास्त्रनिषिद्ध) वस्तुको चाहता है, श्वशुर होकर पुत्रवधूके साथ परिहास पसंद करता है तथा पुत्रवधूसे एकान्तवास करके भी निर्भय होकर समाजमें अपनी प्रतिष्ठा चाहता है, परस्त्रीमें अपने वीर्यका आधान करता है, मर्यादाके बाहर स्त्रीकी निन््दा करता है, किसीसे कोई वस्तु पाकर भी “याद नहीं है” ऐसा कहकर उसे दबाना चाहता है, माँगनेपर दान देकर उसके लिये अपनी श्लाघा करता है और झूठको सही साबित करनेका प्रयास करता है
yaścābhijātaḥ prakaroty akāryaṃ yaścābalo balinā nityavairī | aśraddadhānāya ca yo bravīti yaścākāmyaṃ kāmayate narendra ||
यश्चाभिजातः प्रकरोत्यकार्यं यश्चाबलो बलिना नित्यवैरी । अश्रद्धधानाय च यो ब्रवीति यश्चाकाम्यं कामयते नरेन्द्र ॥ एतेऽपि पाशहस्तैः यमदूतैर्निरयं नीयन्ते—योऽभिजातोऽप्यकार्यं करोति; योऽबलो बलिनां नित्यं वैरं बिभर्ति; योऽश्रद्धधानायोपदिशति; यश्चाकाम्यं शास्त्रनिषिद्धं वा कामयते ॥
विदुर उवाच