Udyoga Parva, Adhyaya 2 — Baladeva’s Counsel on Peace, Restitution, and Court Protocol
उत्सृज्य तान् सौबलमेव चायं॑ समाह्दयत् तेन जितो$क्षवत्याम् । अजमीढवंशी कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर जूएका खेल नहीं जानते थे। इसीलिये समस्त सुहृदोंने इन्हें मना किया था, (परंतु इन्होंने किसीकी बात नहीं मानी।) दूसरी ओर गान्धारराजका पुत्र शकुनि जूएके खेलमें निपुण था। यह जानते हुए भी ये उसीके साथ बारंबार खेलते रहे। इन्होंने कर्ण और दुर्योधनको छोड़कर शकुनिको ही अपने साथ जूआ खेलनेके लिये ललकारा था। उस सभामें दूसरे भी हजारों जुआरी मौजूद थे, जिन्हें युधिष्ठिर जीत सकते थे। परंतु उन सबको छोड़कर इन्होंने सुबलपुत्रको ही बुलाया। इसीलिये उस जूएमें इनकी हार हुई
utsṛjya tān saubalam eva cāyaṁ samāhvayat tena jito ’kṣavatyām | ajamīḍhavaṁśī kuruśreṣṭha yudhiṣṭhira
बलराम उवाच— अन्यान् सर्वान् उत्सृज्यायं कुरुश्रेष्ठो युधिष्ठिरोऽजमीढवंशसम्भवः सौबलमेवाक्षवत्यां समाह्वयत्; तेन च जितोऽभवत्। सुहृद्भिः प्रतिषिद्धोऽपि न शुश्राव; शकुनेरक्षविद्याप्रवीणत्वं विदित्वापि पुनः पुनस्तमेव प्रतिद्वन्द्विनं चकार। सभायां बहवोऽपि द्यूतविदोऽसन्, येषां जये स शक्नोति; तान् सर्वान् विहाय सौबलपुत्रमेवाह्वयत्। तस्मादस्य द्यूते पराजयः केवलं दैवात् न, स्वेच्छया कृतादोषपूर्णवरणात्।
बलदेव उवाच