Pāṇḍava-senā-niryāṇa and Vyūha-vibhāga (पाण्डवसेनानिर्याण तथा व्यूहविभाग)
उलूकं॑ भरतश्रेष्ठ सामपूर्वमथोर्जितम् । दुर्योधनस्य तद् वाक््यं निशम्य भरतर्षभ:,भरतश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार युधिष्ठिरने उलूकसे पहले मधुर वचन बोलकर फिर ओजस्वी शब्दोंमें उत्तर दिया। (उलूकके मुखसे) पहले दुर्योधनके पूर्वोक्त संदेशको सुनकर भरतकुलभूषण युधिष्छिर रोषसे अत्यन्त लाल हुए नेत्रोंद्वारा देखते हुए विषधर सर्पके समान उच्छवास लेने लगे। फिर ओठोंके दोनों कोनोंको चाटते हुए वे श्रीकृष्ण तथा भाइयोंकी ओर देखकर बोलनेको प्रस्तुत हुए। वे अपनी विशाल भुजा ऊपर उठा धूर्त जुआरी शकुनिके पुत्र उलूकसे मुसकराते हुए-से बोले---
sañjaya uvāca | ulūkaṃ bharataśreṣṭha sāmapūrvam athorjitam | duryodhanasya tad vākyaṃ niśamya bharatarṣabhaḥ ||
उलूकं भरतश्रेष्ठ सामपूर्वमथोर्जितम् । दुर्योधनस्य तद् वाक्यं निशम्य भरतर्षभः ॥
संजय उवाच