Ulūka’s Provocation and Keśava’s Counter-Message (उलूकदूत्ये केशवप्रत्युत्तरम्)
एवं कत्थसि कौन्तेय अकत्थन् पुरुषो भव | “अभी युद्धमें भीष्मजीके साथ मुठभेड़ किये बिना तुम क्यों अपनी झूठी प्रशंसा करते हो? कुन्तीनन्दन! जैसे कोई शक्तिहीन एवं मन्दबुद्धि पुरुष गन्धमादन पर्वतपर चढ़ना चाहता हो, उसी प्रकार तुम भी अपनी झूठी बड़ाई करते हो। मिथ्या आत्मप्रशंसा न करके पुरुष बनो'
evaṁ katthasi kaunteya akatthan puruṣo bhava |
सञ्जय उवाच— एवं कत्थसि कौन्तेय, अकत्थन् पुरुषो भव। भीष्मेण सह युद्धेऽसम्भाष्यैव किमर्थं मिथ्या श्लाघसे? यथा दुर्बलः मन्दबुद्धिश्च गन्धमादनं गिरिमारोहितुमिच्छेत्, तथा त्वमपि मिथ्यात्मप्रशंसां करोषि। मा मिथ्या श्लाघस्व; पुरुषो भव।
संजय उवाच