सुभू: सुदंष्ट्र: सुहनु: सुबाहु: सुमुखो5कृश: । सुजन्रु: सुविशालाक्ष: सुपाद: सुप्रतिक्तित:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान् महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान् वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है
subhūḥ sudaṁṣṭraḥ suhanūḥ subāhuḥ sumukho'kṛśaḥ | sujānuḥ suviśālākṣaḥ supādaḥ supratikṣitaḥ ||
सुभूः सुदंष्ट्रः सुहनुः सुबाहुः सुमुखोऽकृशः । सुजानुः सुविशालाक्षः सुपादः सुप्रतिष्ठितः ॥
वैशम्पायन उवाच
The verse (and its surrounding passage) frames martial excellence as ethically charged responsibility: extraordinary power and protection are praised not for vanity, but for bearing the harsh burdens of dharma in war—enduring fearsome weapons and leading others when conflict becomes unavoidable.
Vaiśaṃpāyana recounts a laudatory description of Dhṛṣṭadyumna through a chain of auspicious epithets. In the broader context, he is presented as a divinely manifested commander—born from the fire-rite, armed and chariot-mounted—considered uniquely capable of withstanding Bhīṣma’s dreadful arrows and destined to bring about Droṇa’s downfall.