Udyoga-parva Adhyāya 130: Kuntī’s Instruction on Rājadharma and Daṇḍanīti
संजयं च महाभागमृषींश्षैव तपोधनान् । प्रादात् तेषां स भगवान् दिव्यं चक्षुर्जनार्दन:,समस्त रोमकूपोंसे सूर्यके समान दिव्य किरणें छिटक रही थीं। महात्मा श्रीकृष्णके उस भयंकर स्वरूपको देखकर समस्त राजाओंके मनमें भय समा गया और उन्होंने अपने नेत्र बंद कर लिये। द्रोणाचार्य, भीष्म, परम बुद्धिमान् विदुर, महाभाग संजय तथा तपस्याके धनी महर्षियोंको छोड़कर अन्य सब लोगोंकी आँखें बंद हो गयी थीं। इन द्रोण आदिको भगवान् जनार्दनने स्वयं ही दिव्य दृष्टि प्रदान की थी (अतः वे आँख खोलकर उन्हें देखनेमें समर्थ हो सके)
sañjayaṃ ca mahābhāgam ṛṣīṃś caiva tapodhanān | prādāt teṣāṃ sa bhagavān divyaṃ cakṣur janārdanaḥ ||
वैशम्पायन उवाच—संजयं च महाभागमृषींश्चैव तपोधनान्। प्रादात् तेषां स भगवान् दिव्यं चक्षुर्जनार्दनः॥
वैशम्पायन उवाच