Svargārohaṇa-parva Adhyāya 2 — Yudhiṣṭhira’s Inquiry for His Kin and the Vision of a Punitive Realm
आयाति वत्वयि दुर्धर्षे वाति पुण्य: समीरण: । तव गन्धानुगस्तात येनास्मान् सुखमागमत्,“आप दुर्धर्ष महापुरुषके आते ही परम पवित्र हवा चलने लगी है। तात! वह हवा आपके शरीरकी सुगन्ध लेकर आ रही है जिससे हमलोगोंको बड़ा सुख मिला है
āyāti vat tvayi durdharṣe vātti puṇyaḥ samīraṇaḥ | tava gandhānugas tāta yenāsmān sukham āgamat ||
वैशम्पायन उवाच— आयाति त्वयि दुर्धर्षे वाति पुण्यः समीरणः। तव गन्धानुगस्तात येनास्मान् सुखमागमत्॥
वैशम्पायन उवाच