स्त्रीपर्व १: धृतराष्ट्रशोकः संजयाश्वासनं च
Strī Parva 1: Dhṛtarāṣṭra’s Lament and Saṃjaya’s Consolation
मध्यस्थो हि त्वमप्यासीर्न क्षमं किज्चिदुक्तवान् । दुर्धरेण त्वया भारस्तुलया न सम॑ धृत:,“आप भी मध्यस्थ बनकर बैठे रहे, उसे कोई उचित सलाह नहीं दी। आप दुर्धर्ष वीर थे -- आपकी बात कोई टाल नहीं सकता था, तो भी आपने दोनों ओरके बोझेको समभावसे तराजूपर रखकर नहीं तौला
मध्यस्थो हि त्वमप्यासीर्न क्षमं किञ्चिदुक्तवान्। दुर्धरेण त्वया भारस्तुलया न समं धृतः।
वैशमग्पायन उवाच