Kṣātra-dharma in Campaign and Battle: Protection, Purification, and the Ideal Warrior’s End (क्षात्रधर्मः—अभियानयुद्धे रक्षणदानशुद्धिः)
इदं दुःखं महत् कष्ट पापीय इति निष्टनन् । प्रतिध्वस्तमुख: पूतिरमात्याननुशोचयन्,“यह बड़ा दुःख है। बड़ी पीड़ा हो रही है! यह मेरे किसी महान् पापका सूचक है।' इस प्रकार आर्तनाद करना, विकृत-मुख हो जाना, दुर्गन्धित शरीरसे मन्त्रियोंके लिये निरन्तर शोक करना, नीरोग मनुष्योंकी-सी स्थिति प्राप्त करनेकी कामना करना और वर्तमान रुग्णावस्थामें बारंबार मृत्युकी इच्छा रखना--ऐसी मौत किसी स्वाभिमानी वीरके योग्य नहीं है
idaṃ duḥkhaṃ mahat kaṣṭa pāpīya iti niṣṭanan | pratidhvastamukhaḥ pūtir amātyān anuśocayan |
इदं दुःखं महत्कष्टं पापीय इति निष्टनन्। प्रतिध्वस्तमुखः पूतिरमात्याननुशोचयन्॥
भीष्म उवाच