Daṇḍanīti and the King as the Cause of Yuga-Order (दण्डनीतिः राजधर्मश्च युगकारणत्वम्)
जिन वस्तुओंको त्रिवर्गके अन्तर्गत बताया गया है, उनको भी यहाँ एकचित्त होकर सुनो। क्षय, स्थान और वृद्धि--ये ही त्रिवर्ग हैं तथा धर्म, अर्थ और काम--इनको परम त्रिवर्ग कहा गया है। इन सबका समयानुसार सेवन करना चाहिये। राजा धर्मके अनुसार चले तो वह पृथ्वीका दीर्घकालतक पालन कर सकता है ।। अस्मिन्नर्थे च श्लोकौ द्वौ गीतावड्धिरसा स्वयम् । यादवीपुत्र भद्रं ते तावपि श्रोतुमहसि,पृथापुत्र युधिष्ठिर! तुम्हारा कल्याण हो। इस विषयमें साक्षात् बृहस्पतिजीने जो दो श्लोक कहे हैं, उन्हें भी तुम सुनो
bhīṣma uvāca |
trivargāntargatā ye 'rthā uktāḥ, tān apihaikacitto niśāmaya |
kṣayaḥ sthānaṁ ca vṛddhiś ca—eṣa eva trivargaḥ; dharmo 'rthaḥ kāmaś ca—ete paramas trivargaḥ |
teṣāṁ sarveṣāṁ kālena sevanaṁ kartavyam |
rājā dharmānusārī syāt, sa pṛthivīṁ dīrghakālaṁ pālayituṁ śaknoti ||
asminn arthe ca ślokau dvau gītau bṛhaspatinā svayam |
yādavīputra, bhadraṁ te; tāv api śrotum arhasi, pṛthāputra yudhiṣṭhira ||
त्रिवर्गे ये पदार्था उक्तास्तानप्येकमनाḥ शृणु। क्षयः स्थानं च वृद्धिश्च त्रिवर्गः; धर्मार्थकामाः परस्त्रिवर्ग उच्यते। एते सर्वे यथाकालं सेवनीयाः। राजा धर्मानुगः सन् चिरं पृथिवीं पालयितुं शक्नोति। अस्मिन्नर्थे बृहस्पतिना स्वयमेव द्वौ श्लोकौ गीतौ—पृथापुत्र युधिष्ठिर, भद्रं ते; तावपि श्रोतुमर्हसि।
भीष्म उवाच