राजा-दैवतत्वम् — The King as a Stabilizing ‘Daivata’ (Divine Function) in Social Order
प्रीयते हि हरन् पाप: परवित्तमराजके । यदास्य उद्धरन्त्यन्ये तदा राजानमिच्छति,अराजकताकी स्थितिमें दूसरोंके धनका अपहरण करनेवाला पापाचारी मनुष्य बड़ा प्रसन्न होता है, परंतु जब दूसरे लुटेरे उसका भी सारा धन हड़प लेते हैं, तब वह राजाकी आवश्यकताका अनुभव करता है
प्रीयते हि हरन् पापः परवित्तमराजके। यदास्य उद्धरन्त्यन्ये तदा राजानमिच्छति॥
भीष्म उवाच