Varṇāśrama-ācāra and Vikarma: Yudhiṣṭhira’s Inquiry on Safe Dharmas (शिवधर्मप्रश्नः)
यत्रास्तमितशायी स्यान्निराशीरनिकेतन: । यथोपलब्धजीवी स्यान्मुनिर्दान्तो जितेन्द्रिय:,संन्यासीको चाहिये कि वह मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए मुनिवृत्तिसे रहे। किसी वस्तुकी कामना न करे। अपने लिये मठ या कुटी न बनवाये। निरन्तर घूमता रहे और जहाँ सूर्यास्त हो वहीं ठहर जाय। प्रारब्धवश जो कुछ मिल जाय, उसीसे जीवन-निर्वाह करे
yatrāstamitaśāyī syān nirāśīr aniketanaḥ | yathopalabdhajīvī syān munir dānto jitendriyaḥ ||
भीष्म उवाच—यत्रास्तमितशायी स्यान्निराशीरनिकेतनः। यथोपलब्धजीवी स्यान्मुनिर्दान्तो जितेन्द्रियः॥
भीष्म उवाच