Varṇa-dharma and Rājadharma: Yudhiṣṭhira’s Inquiry and Bhīṣma’s Normative Outline (वर्णधर्म-राजधर्म-प्रश्नोत्तरम्)
दशाध्यायसहस्तराणि सुब्रह्मण्यो महातपा:,महातपस्वी सुब्रह्मण्य भगवान् पुरन्दरने जब इसका अध्ययन किया, उस समय इसमें दस हजार अध्याय थे। फिर उन्होंने भी इसका संक्षेप किया, जिससे यह पाँच हजार अध्यायोंका ग्रन्थ हो गया। तात! वही ग्रन्थ “बाहुदनतक” नामक नीतिशास्त्रके रूपमें विख्यात हुआ
दशाध्यायसहस्राणि सुब्रह्मण्यो महातपाः । पुरन्दरः समध्यैत ततोऽपि संक्षिप्य तं पुनः । पञ्चाध्यायसहस्रं तु कृत्वा बाहुदन्तकं स्मृतम् ॥
भीष्म उवाच