अध्याय ५७ — राज्ञः नित्यप्रयत्नः, रक्षा-प्रधानता, तथा त्याग-नीतिः
Chapter 57: Constant Royal Vigilance, Primacy of Protection, and Principles of Dismissal
द्विट्छिद्रदर्शी नृपतिर्नित्यमेव प्रशस्यते । त्रिवर्ग विदितार्थश्न युक्तचारोपधिश्व॒ यः:,शत्रुओंके छिद्र देखनेवाले राजाकी सदा ही प्रशंसा की जाती है। जिसे धर्म, अर्थ और कामके तत्त्वका ज्ञान है तथा जिसने शत्रुओंकी गुप्त बातोंको जानने और उनके मन्त्री आदिको फोड़नेके लिये गुप्तचर लगा रखा है, वह भी प्रशंसाके ही योग्य है
dviṭ-chidra-darśī nṛpatir nityam eva praśasyate | trivarga-viditārthaś ca yukta-cāropadhiś ca yaḥ ||
भीष्म उवाच—यो नृपतिः शत्रूणां द्विच्छिद्रदर्शी नित्यं भवति स सदा प्रशस्यते। तथा यो धर्मार्थकामत्रिवर्गस्य तत्त्वार्थं वेत्ति, शत्रुगूढवृत्त्यन्वेषणे मन्त्रिभेदने च सुयोजितं गुप्तचरप्रतिगुप्तचरजालं धारयति, सोऽपि प्रशंसार्ह एव।
भीष्म उवाच