Rāma–Jāmadagnya-janma-kāraṇa and Kṣatra-kṣaya
Paraśurāma’s origins and the depletion/restoration of kṣatriya lineages
परावसुर्महाराज क्षिप्त्वा55ह जनसंसदि । ये ते ययातिपतने यज्ञे सन्त: समागता:,महाराज! विश्वामित्रके पौत्र तथा रैभ्यके पुत्र महातेजस्वी परावसुने भरी सभामें आक्षेप करते हुए कहा--“राम! राजा ययातिके स्वर्गसे गिरनेके समय जो प्रतर्दन आदि सज्जन पुरुष यज्ञमें एकत्र हुए थे, क्या वे क्षत्रिय नहीं थे? तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी है। तुम व्यर्थ ही जनताकी सभामें डींग हाँका करते हो कि मैंने क्षत्रियोंका अन्त कर दिया। मैं तो समझता हूँ कि तुमने क्षत्रिय वीरोंके भयसे ही पर्वतकी शरण ली है। इस समय पृथ्वीपर सब ओर पुनः सैकड़ों क्षत्रिय भर गये हैं!
parāvasur mahārāja kṣiptvā ha jana-saṁsadi | ye te yayāti-patane yajñe santaḥ samāgatāḥ ||
परावसुर्महाराज क्षिप्त्वा जनसंसदि। ये ते ययातिपतने यज्ञे सन्तः समागताः— “राम! प्रतर्दनप्रभृतयो नूनं क्षत्रिया एव ते। मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं व्यर्थं कत्थसे जनसंसदि— ‘क्षत्रियान् नाशितवान् अहम्’ इति। क्षत्रियवीरभयादेव पर्वताश्रयं गतवान्। अद्यापि पृथिव्यां सर्वतोऽपि शतानि क्षत्रियाणां पुनरुत्थितानि।”
वासुदेव उवाच