धर्मस्य बहुद्वारत्वम् — Nārada’s Audience with Indra (Śānti-parva 340)
एतां सृष्टि विजानीहि कल्पादिषु पुनः पुन: । यथा सूर्यस्य गगनादुदयास्तमने इह,“कल्पके आदिमें बारंबार इस सृष्टिको मैं प्रकट करता हूँ (और अन्तमें इसका संहार कर डालता हूँ)। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो। जैसे आकाशसे सूर्यका उदय होता है और आकाशमें ही वह अस्त होता है--ये उदय-अस्तके क्रम सदा चलते रहते हैं (उसी प्रकार मुझसे ही जगत्की उत्पत्ति होती है और मुझमें ही उसका लय होता है। यह सृष्टि और संहारका क्रम यों ही चला करता है)
etāṁ sṛṣṭiṁ vijānīhi kalpādiṣu punaḥ punaḥ | yathā sūryasya gaganād udayāstamane iha ||
एतां सृष्टिं विजानीहि कल्पादिषु पुनः पुनः। यथा सूर्यस्य गगनादुदयास्तमने इह॥
भीष्म उवाच