यत् त्वया प्राप्तमद्येह एकान्तगतबुद्धिना । वे अवतार लोकहितके कार्य सम्पन्न करके पुन: अपने मूलस्वरूपमें मिल गये हैं। मुझमें अनन्य भक्ति रखनेके कारण आज तुमने यहाँ जिस स्वरूपका दर्शन पाया है, मेरे ऐसे स्वरूपका दर्शन अबतक ब्रह्माको भी नहीं प्राप्त हो सका है
यत् त्वया प्राप्तमद्येह एकान्तगतबुद्धिना। अनन्यभक्त्या मे रूपं दृष्टं यत्तेऽद्य दुर्लभम्॥ अवताराः लोकहितं कृत्वा स्वं मूलरूपं समाश्रिताः। ब्रह्मणोऽपि न लब्धं यद् दर्शनं तादृशं मम॥
(भीष्म उवाच