परस्परस्य विद्यां वै त्वं निबोधानुपूर्वश: । यथोक्तमृषिभिस्तात सांख्यस्याभिनिदर्शनम्,तात! ऋषियोंने जिस प्रकार सांख्यदर्शनकी बात बतायी है, उसी प्रकार तुम अव्यक्तका जो पारस्परिक भेद है, उनमें जो जिसकी विद्या है अर्थात् श्रेष्ठ है, उसका वर्णन क्रमसे सुनो
परस्परस्य विद्यां वै त्वं निबोधानुपूर्वशः। यथोक्तमृषिभिस्तात सांख्यस्याभिनिदर्शनम्॥
वसिष्ठ उवाच