अव्यक्त–पुरुष–विवेकः (Discrimination of Avyakta/Prakṛti and Puruṣa) — Yājñavalkya’s Anvīkṣikī to Viśvāvasu
अर्थतत्त्वके ज्ञाता पुरुषको यह जानना चाहिये कि प्रलयकालमें प्रकृतिमें भी एकता और सृष्टिकालमें अनेकता रहती है। इसी प्रकार पुरुष भी प्रलयकालमें एक ही रहता है; किंतु सृष्टिकालमें प्रकृतिका प्रेरक होनेके कारण उसमें नानात्वका आरोप हो जाता है ।। बहुधा5>त्मा प्रकुर्वीत प्रकृतिं प्रसवात्मिकाम् । तच्च क्षेत्र महानात्मा पठचविंशोडथधितिछति,परमात्मा ही प्रसवात्मिका प्रकृतिको नाना रूपोंमें परिणत करता है। प्रकृति और उसके विकारको क्षेत्र कहते हैं। चौबीस तत्त्वोंसे भिन्न जो पचीसवाँ तत्त्व महान् आत्मा है, वह क्षेत्रमें अधिष्ठातारूपसे निवास करता है
arthatattvake jñātā puruṣako yaḥ jñātum icchati sa jñātavyam—pralayakāle prakṛtau api ekatā, sṛṣṭikāle ca anekatā vartate. evam eva puruṣaḥ pralayakāle eka eva; kintu sṛṣṭikāle prakṛteḥ prerakatvāt tasmin nānātvasyāropaḥ bhavati. bahudhā ātmā prakurvīta prakṛtiṃ prasavātmikām; tac ca kṣetraṃ mahān ātmā pañcaviṃśo ’dhi tiṣṭhati.
प्रलये प्रकृतिरैक्यं सर्गे नानात्वमृच्छति । तथैव पुरुषोऽप्येकः प्रलये सर्गकर्मणि ॥ प्रकृतिप्रेरणादस्य नानात्वमुपपद्यते । बहुधात्मा प्रकुर्वीत प्रकृतिं प्रसवात्मिकाम् ॥ क्षेत्रं प्रकृतिविकारौ तच्च क्षेत्रं प्रकीर्तितम् । चतुर्विंशतितत्त्वेभ्यः पञ्चविंशो महान् आत्मा ॥ क्षेत्रेऽधिष्ठातरूपेण साक्षीवदवतिṣ्ठते ॥
वसिष्ठ उवाच