Akṣara–Kṣara Viveka: Vasiṣṭha–Karāla-Janaka Saṃvāda (अक्षर-क्षर विवेकः)
जो मनुष्य दुष्कर्म करके वर्णसे भ्रष्ट हो जाता है, वह कदापि सम्मान पानेके योग्य नहीं है। इसके सिवा जो मनुष्य सत्त्वगुणके द्वारा सत्कार पाकर फिर राजस कर्मका सेवन करने लगता है, वह भी सम्मानके योग्य नहीं है ।। वर्णोत्कर्षमवाप्रोति नर: पुण्येन कर्मणा । दुर्लभ तमलब्ध्वा हि हन्यात् पापेन कर्मणा,पुण्य कर्मसे ही मनुष्य उत्तम वर्णमें जन्म पाता है। पापीके लिये वह अत्यन्त दुर्लभ है। वह उसे न पाकर अपने पाप कर्मके द्वारा अपना ही नाश करता है
varṇotkarṣam avāpnoti naraḥ puṇyena karmaṇā | durlabhaṃ tam alabdhvā hi hanyāt pāpena karmaṇā ||
पराशर उवाच—यो मनुष्यः दुष्कर्मणा वर्णाद् भ्रश्यति स न कदाचन सम्मानमर्हति। यश्च सत्त्वगुणेन सत्कृतः सन् पुनः राजसं कर्म सेवते सोऽपि न सम्मानयोग्यः॥ वर्णोत्कर्षमवाप्नोति नरः पुण्येन कर्मणा। दुर्लभं तमलब्ध्वा हि हन्यात् पापेन कर्मणा॥
पराशर उवाच
Moral and social elevation comes from puṇya (virtuous action). If one cannot sustain virtue and instead returns to pāpa or rājasic conduct after receiving honor, one becomes unworthy of respect and ultimately causes one’s own downfall.
In Śānti Parva’s didactic discourse, the sage Parāśara instructs on ethical conduct: he links ‘varṇa/standing’ to karma, warning that wrongdoing leads to loss of status and self-ruin, while sustained sāttvika virtue is the basis of true honor.